स्वान्तः सुखाय 58
महाअष्टमी : प्रसाद भोग व धूप
दशहरे के पूर्व आने वाली महाअष्टमी का कुटुंब में बड़ा महत्व हुआ करता था। परिवार के छोटे बड़े जो भी सदस्य नौकरी या पढ़ाई आदि के सिलसिले में बाहर होते थे उन्हें भी एक तरह से महाअष्टमी के दिन घर आना जरूरी होता था। यह एक परंपरा सी बनी हुई थी। दशहरे या दिवाली पर यदि न आ सकें तो एक बार स्वीकार्य होता किन्तु 'माता पूजन' के प्रसाद की धूप देने के लिए परिवार के हर सदस्य का उपस्थित होना जरूरी होता था।
इस बहाने अबोले में चल रहे सगे संबंधियों में पुनः संवाद शुरू होने की गुंजाइश भी रहती थी। भले मतभेद बने रहते किन्तु मनभेद थोड़े कम हो जाया करते थे।
माता का प्रसाद बनना और पूजन आदि भी उसी घर में होता था जहां परिवार के मुखिया का निवास होता। बोलचाल में उसे 'बड़ा घर' कहते। बड़े घर पर सब इकट्ठा होकर पूजन,भोजन आदि एक साथ करते थे।
हमारे यहां भी ऐसा ही होता था। इसके अलावा कई बार हमारे नाना व नानी का भी स्नेह सानिध्य हमे मिल जाता था। दरअसल, उन्होंने किसी कठिन क्षण में यह मानता या संकल्प ले लिया था कि हर वर्ष नवरात्रि का समय चामुंडा की नगरी देवास में ही गुजारेंगे। पूरी नवरात्रि और दशहरे तक वे यहां रहते तो घर में बड़ी चहल पहल बनी रहती। नाते रिश्तेदार भी उनसे मिलने जुलने आते। कुटुंब में नए सगाई संबंधों और रिश्तों के सूत्र खोजने में उनकी बड़ी मदद रहती थी।
नौकरी में मैं जब भी बाहर रहा महाअष्टमी के दिन माँ के पास देवास आ ही जाता था। कुटुंब के कई परिवारों में तो प्रसाद के बनने की बड़ी कठिन व्यवस्था होती थी। घर की घट्टी पर अनाज पीसा जाता था। बनता हुआ भोग कोई अन्य व्यक्ति देख नहीं सकता था। स्वयं घर की महिलाएं ही प्रसाद भोग की तैयारी कर बनातीं थीं।
हमारी दादी अधिक कट्टर नहीं थीं,उन्होंने माँ को भी रियायतें दे रखीं थी। जमाने के हिसाब से जो सहजता से संभव हो वह करने की छूट मिल गई थी। बाद में पत्नी को भी यह रियायत प्राप्त हो गई।
हाँ, इतना अवश्य था कि प्रसाद में भेल नहीं करना होता है, जैसे पकोड़ी सिर्फ बेसन की बनेगी,उसमें हरी मिर्च और प्याज नहीं पड़ेगा। पूरियों में नमक नहीं डलेगा। इसके पीछे का तथ्य मुझे अब तक समझ नहीं आया।
यह भी दिलचस्प है कि बिना भेल का भोग लगाने वाले हमारे परिवार में अष्टमी की धूप अष्टमी-नवमी के भेल समय में दी जाने की परंपरा है। सबके यहां अष्टमी की दोपहर भोग लगता है हमारे यहां गोधूलि बेला में।
प्रतिवर्ष अष्टमी के दिन प्रातः देवास की बड़ी माता तुलजा भवानी मंदिर में कभी दादाजी नियमित हवन करवाया करते थे। बाद में पिताजी उस दिन नारियल व पूजा सामग्री चढ़ाकर आते रहे। बाद में स्थानीय भाई आदि यह जिम्मेदारी निभाने लगे।
अब तो कुटुंब में सामूहिक पूजन कभी कभार ही सम्भव हो पाता है। इकट्ठा होने की वह परम्परा निभाई जाने की स्थितियां वैसी नहीं रहीं।
हालांकि भोग अब भी लगता है, माता को धूप भी दी जाती है। पात्र में उठती अग्नि और धूम्र का चित्र वाट्सएप पर शेयर हो जाता है। परदेस में बैठे बच्चे अगली सुबह जागने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके प्रणाम कर लेते हैं....
ब्रजेश कानूनगो