Saturday, 11 July 2026

घड़ी, धागा और मन्नतें : आस्था, मनोविज्ञान और विज्ञान के बीच मनुष्य की अनवरत यात्रा

घड़ी, धागा और मन्नतें : आस्था, मनोविज्ञान और विज्ञान के बीच मनुष्य की अनवरत यात्रा

छत्तीसगढ़ के बलौदाबाज़ार-भाटापारा जिले के बिरेझर गांव के एक मंदिर में एक अनोखी परंपरा प्रचलित है। यहां श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने की आशा में मंदिर परिसर में घड़ी बांधते हैं। स्थानीय विश्वास है कि जब वह घड़ी किसी दिन अपने आप बंद हो जाती है, तब समझा जाता है कि मन्नत पूरी होने वाली है और याचक का "अच्छा समय" प्रारंभ हो गया है। पहली दृष्टि में यह एक सामान्य धार्मिक परंपरा लग सकती है, किंतु वास्तव में यह मनुष्य की उस शाश्वत इच्छा का प्रतीक है जिसमें वह अपने भविष्य, आशाओं और अनिश्चितताओं को किसी प्रतीक के माध्यम से अर्थ देना चाहता है।

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में ऐसी अनेक परंपराएं हैं। राजस्थान के अजमेर शरीफ की जालियों पर लोग धागे बांधते हैं। महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में तेल चढ़ाने की परंपरा है। हिमाचल और उत्तराखंड के कई मंदिरों में घंटियां बांधी जाती हैं। कहीं लाल चुनरी चढ़ाई जाती है, कहीं नारियल, कहीं छोटे-छोटे ताले लगाकर इच्छाओं को "बंद" कर दिया जाता है। वाराणसी में लोग दीपदान करते हैं तो दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में चांदी के छोटे अंग अर्पित किए जाते हैं, यह विश्वास करते हुए कि संबंधित रोग दूर होगा।

विश्व में भी ऐसी परंपराएं कम नहीं हैं। जापान के शिंतो मंदिरों में श्रद्धालु लकड़ी की छोटी पट्टिकाओं (एमा) पर अपनी इच्छाएं लिखकर टांगते हैं। आयरलैंड और स्कॉटलैंड में "विशिंग ट्री" और "क्लूटी वेल" के पास कपड़े की पट्टियां बांधने की परंपरा है। इटली के रोम स्थित ट्रेवी फाउंटेन में सिक्का फेंकने से दोबारा वहां आने की कामना की जाती है। तुर्किये के "विशिंग ट्री" पर रंगीन फीते बांधे जाते हैं। फ्रांस के लूर्द में लोग चमत्कारी जल में स्वास्थ्य लाभ की आशा लेकर पहुंचते हैं।

इन सभी परंपराओं का बाहरी स्वरूप अलग-अलग है, लेकिन उनका मूल भाव एक ही है—अनिश्चित भविष्य के सामने आशा का संबल। यहीं से प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में घड़ी बंद होने से अच्छा समय शुरू हो जाता है? क्या धागा बांधने से इच्छा पूरी होती है? क्या सिक्का फेंकने से भाग्य बदल जाता है?

विज्ञान का उत्तर स्पष्ट है। किसी घड़ी का बंद होना उसकी बैटरी समाप्त होने, यांत्रिक खराबी या मौसम के प्रभाव का परिणाम हो सकता है। धागा बांधने या घंटी चढ़ाने से प्राकृतिक नियम नहीं बदलते। चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार या जीवन की समस्याओं का समाधान परिश्रम, उचित निर्णय और सामाजिक व्यवस्थाओं से ही संभव है। वैज्ञानिक दृष्टि हमें सिखाती है कि किसी घटना को कारण और परिणाम के प्रमाणों के आधार पर परखना चाहिए, केवल संयोग के आधार पर नहीं।

मनोविज्ञान भी एक रोचक तथ्य सामने रखता है। इसे "कन्फर्मेशन बायस" कहा जाता है। यदि सौ लोगों ने मन्नत मांगी और उनमें दस लोगों की इच्छा संयोगवश पूरी हो गई, तो वही दस लोग अपनी कहानी सुनाते हैं; जिनकी मन्नत पूरी नहीं हुई, वे अक्सर चर्चा का विषय नहीं बनते। धीरे-धीरे विश्वास और मजबूत होता जाता है। इसी प्रकार "प्लेसीबो प्रभाव" भी व्यक्ति में आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच पैदा कर सकता है, जिससे उसके व्यवहार में परिवर्तन आता है और कभी-कभी परिणाम भी बेहतर हो जाते हैं।

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि ऐसी सभी परंपराएं केवल अंधविश्वास हैं? उत्तर इतना सरल भी नहीं है। आस्था केवल चमत्कार की अपेक्षा नहीं होती; वह मनुष्य के सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा है। मंदिर में घड़ी बांधना, किसी दरगाह पर धागा बांधना या चर्च में मोमबत्ती जलाना अनेक लोगों के लिए आत्मिक शांति, सामुदायिक जुड़ाव और मानसिक संतुलन का माध्यम भी है। कठिन परिस्थितियों में आशा मनुष्य को टूटने से बचाती है। जब विज्ञान उपचार देता है, तब आस्था कई बार धैर्य देती है। दोनों की भूमिकाएं अलग-अलग हो सकती हैं।

समस्या तब शुरू होती है जब प्रतीक को ही वास्तविक कारण मान लिया जाता है। यदि कोई व्यक्ति केवल मन्नत के भरोसे इलाज छोड़ दे, शिक्षा की जगह चमत्कार खोजने लगे या सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रयास करने के बजाय केवल प्रतीकों पर निर्भर हो जाए, तब आस्था अंधश्रद्धा में बदल जाती है। दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति इन परंपराओं का पालन करते हुए अपने कर्तव्यों, परिश्रम और विवेक को भी महत्व देता है, तब यह व्यक्तिगत सांस्कृतिक अभिव्यक्ति बनकर रह जाती है।

भारतीय संविधान भी इसी संतुलन की ओर संकेत करता है। एक ओर वह प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था और पूजा-पद्धति का अधिकार देता है, दूसरी ओर वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा की भावना विकसित करना भी नागरिकों का कर्तव्य बताता है। अर्थात समाज से यह अपेक्षा नहीं है कि वह अपनी आस्थाओं का त्याग कर दे, बल्कि यह कि वह उन्हें विवेक के साथ जीए।

बिरेझर की घड़ी इसलिए केवल एक घड़ी नहीं है। वह मनुष्य की उस गहरी मनोवैज्ञानिक आवश्यकता का प्रतीक है जिसमें वह समय को अपने पक्ष में होते देखना चाहता है। शायद घड़ी वास्तव में समय नहीं बदलती, लेकिन वह व्यक्ति को यह विश्वास अवश्य दिलाती है कि कठिन समय स्थायी नहीं है। और कई बार यही विश्वास उसे संघर्ष करते रहने की शक्ति देता है।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि हम ऐसी परंपराओं का उपहास करें या उन्हें अंतिम सत्य घोषित कर दें। आवश्यकता यह है कि हम उनमें निहित सांस्कृतिक संवेदना और मानवीय मनोविज्ञान को समझें, साथ ही वैज्ञानिक सोच को भी बराबर महत्व दें। आस्था यदि आशा दे, नैतिकता सिखाए और मनुष्य को बेहतर बनने की प्रेरणा दे, तो उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन यदि वह भय, शोषण, आर्थिक दोहन या विवेकहीनता का माध्यम बन जाए, तो प्रश्न पूछना भी उतना ही आवश्यक है।

शायद सबसे उचित निष्कर्ष यही है कि घड़ी का रुकना किसी का समय नहीं बदलता; समय तब बदलता है जब आशा, परिश्रम और विवेक एक साथ चलने लगते हैं। आस्था उस यात्रा का भावनात्मक सहारा हो सकती है, लेकिन मंजिल तक पहुंचाने वाला कदम अंततः मनुष्य को स्वयं ही उठाना पड़ता है।

ब्रजेश कानूनगो 


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