स्वान्तः
सुखाय 34 व 35
34
देहात की बस
यात्रा
कुछ अपवादों
को छोड़ दें तो इसमें कोई शक नहीं है कि पिछले तीस चालीस वर्षों में हमारे नितांत
देहात और दुर्गम क्षेत्र भी कस्बों,शहरों और महानगरों से जुड़ गए हैं।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री सड़क योजनाओं में गांवों तक पक्की सड़कें बनाने का काफी
काम हुआ है। मनरेगा जैसी ग्रामीण रोजगार देने वाली महत्वपूर्ण पहल ने भी गांवों के
विकास में अच्छी भूमिका निभाई है। लोगों का आवागमन सुगम हुआ है। बैलगाड़ियां नदारत
हैं। ट्रेक्टरों, मोटर साइकिलों से देहात जाने वाली सड़को पर
रौनक दिखाई देती है। लोक परिवहन की स्थिति भी कुछ बेहतर हुई है।
वर्ष 1978 में अपनी नौकरी की
शुरुआत में और उससे पहले जिन स्थितियों का हमने साक्षात्कार किया था, वे इतनी अच्छी कभी नहीं रहीं। देहात जाने वाली सड़कों की न दशा ठीक होती थी
न वहां तक ले जाने वाली बसों की। आवागमन की दुर्दशा का वह दौर था। पहले तो पक्की
सड़कें होती नहीं थी। कुछ बनाई भी जाती तो वर्षों तक उस बिछी गिट्टियां डामरीकरण का
इंतजार करती रहतीं। इस बीच बरसात का मौसम आता तो गिट्टियां बह जातीं। जिन पर
डामरीकरण हो जाता वे भी हर वर्ष मरम्मत की बाट जोहती रहती थीं। पुलों और पुलियाओं
का निर्माण बहुत आंदोलन आदि करने के बाद किया जाता था। नदियों, नालों पर रपटें होतीं, नदी में उतरकर ही गाड़ियों का
आगे बढ़ना सम्भव हो पाता था। मामूली बरसात होते ही नदी उफान पर आ जाती तो एक ही नदी
के कई मोड़ों पर घण्टों तक बसों को प्रतीक्षा करनी होती। कभी कभी तो सुबह निकला
व्यक्ति तीन घण्टों के सफर की बजाए शाम को गंतव्य पर पहुंच पाता था।
गृह नगर देवास
से प्रति सोमवार जब सुबह छह बजे 100 किलोमीटर दूर अपने पहले कार्यालय कन्नौद के लिए निकलता
तो कई बार ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ता था। उन दिनों 'अमीर एक्सप्रेस' की निजी कम्पनी की बसें नेमावर,हरदा तक जाया करती थीं। 'सलीम भाई' युवा बस चालक हुआ करते थे और थोड़े उम्र दराज व्यक्ति जिन्हें 'दरबार' संबोधित किया जाता था वे कंडक्टर की भूमिका
में होते थे। उस बस में दैनिक और साप्ताहिक रूप से यात्रा करने वालों की संख्या
अधिक होती थी। इस वजह सब एक दूसरे को अच्छी तरह जानने पहचानने लगते थे। सलीम भाई
का ड्राइवर कैबिन लोगों के 'टिफिनो' से
भरा होता था। घर से गए नौकरी पर पदस्थ परिजनों को भोजन इसी तरह भेजा जाता था। सलीम
भाई हर गाँव में एक दो टिफिन डिलीवर करके पुण्य कमाते थे। अखबारों के पैकेट भी इसी
तरह रवाना होते। बस स्टैंडों पर सुबह यही खास हलचल होती थी उन दिनों।
सड़क निर्माण
की तकनीक भी उतनी विकसित नहीं हुई थी। ऊपर से देहातों के विकास की राजनीतिक इच्छा
शक्ति भी कम दिखाई देती थी। विचारक और साहित्यकार जिन्हें आवाज उठानी चाहिये वे भी
'अहा!
ग्राम्य जीवन' जैसी पंक्तियां मात्र लिखकर यथा स्थिति के
पोषक हो जाते।
घण्टों तक नदी
की बाढ़ के उतरने की प्रतीक्षा में घण्टों सड़कों पर अटके रहना पड़ता था। जब पानी कम
होने पर आवागमन शुरू होता तो गाड़ियां फ़सतीं, आड़ी तिरछी होकर पुनः रास्ता जाम कर
देतीं। कुछ किनारे की काली मिट्टी में धंस जाती। बड़ी मशक्कत के बाद यात्रियों की
मदद से उन्हें निकाला जाता। ग्रामीणों की सहायता लेकर, किसी
ट्रेक्टर से खींचकर वाहनों को सड़क पर वापिस लाने में घण्टों लग जाते थे।
बैंक की बरोठा
शाखा में पदस्थी के वक्त के कुछ मजेदार प्रसंग याद आ रहे हैं। बैंकिंग सेवा में दो
वर्षों की ग्रामीण क्षेत्र में नियुक्ति अनिवार्य होती है। अन्यथा पदोन्नति के
अवसर कम हो जाते हैं। बरोठा में इसी संदर्भ में मुझे शाखा प्रबंधक नियुक्त किया
गया था। देवास से आने जाने की स्वीकृति थी। बरोठा था भी केवल 20 किलोमीटर दूर, किन्तु अपने वाहन से जाने का जोखिम कोई लेता नहीं था। मैं तो कम से कम
नहीं लेता था। शाखा में मोटर साइकिल दी हुई थी जो उधर अपने क्षेत्र में ही
निरीक्षण आदि में उपयोग की जानी होती थी। मुझे मोटर साइकिल चलाना आता भी नहीं था,
अपने सहायक स्टाफ सदस्य के पीछे बैठकर ही टूर आदि करता था।
सुबह जो बस
बरोठा जाती थी उसमें ड्राइवर सीट के पीछे की सीट पर ही खिड़की में कांच लगा था।
बाकी बस की सारी खिड़कियों के शीशे नदारत थे। मुझे हमेशा से शीत से समस्या है। ठंडी
हवा सिर और कान पर लगने पर सब कुछ गड़बड़ाने लगता है। चक्कर आने की स्थिति बनने लगती
है। बचाव का सदैव ख्याल रखता हूँ। एक कनटोप साथ में रखता हूँ। खिड़की में शीशा होने
पर भी सहयात्री को असुविधा न हो इस लिए कनटोप धारण करने में कोई संकोच नहीं करता।
बरोठा जाने
वाली बस में बैठने वाला मैं अक्सर पहला यात्री होता था। क्योंकि एक मात्र शीशा लगी
खिड़की के आरक्षण की कोई व्यवस्था तो थी नहीं। घर से जल्दी निकलकर उस सीट पर अपना
कब्जा जमा लेता था। हालांकि बाद में जब ड्राइवर कंडक्टर को मेरी समस्या का पता चला,वह सीट मेरे लिए रिजर्व
रखी जाने लगी।
इस बस के
कंडक्टर और ड्राइवर की स्मृति से कॉमेडी फिल्म 'बॉम्बे तो गोआ' के
महमूद और उनके भाई अनवर की सहज याद आने लगती है। चलती बस में जो हास्य प्रसंग
फ़िल्म में उपस्थित होते हैं उसी तरह के प्रसंग बरोठा जाने वाली बस में हम प्रतिदिन
ही देखा करते थे।
बस का युवा
कंडक्टर बरोठा का ही एक ग्रामीण युवक था। मालवी और हिंदी मिली जुली बोलता था।
ग्रामीणों से ठेठ मालवी में और हम लोगों से शहरी जुबान में संवाद करता था।
उसकी एक बात
बहुत याद आती है। अक्सर बस यात्रा के दौरान कुछ महिला यात्रियों को उल्टी आने व
चक्कर की शिकायत होने लगती है। जब वे इस वजह से कंडक्टर से खिड़की वाली सीट का
आग्रह करतीं तो वह उन्हें माचिस की डिबिया से एक तीली निकालकर दे देता। कहता कि 'लो इसे मुंह में इस तरह रख
लो कि फास्फोरस वाला हिस्सा मुंह में तो रहे लेकिन छुए नहीं।'
यात्री ऐसा कर
भी लेते थे। समस्या भी सुलझ जाती। उल्टी,कै होना रुक जाता। किसी ग्रामीण को
दस्त की समस्या आ जाती तो वह तुरंत एक अखबार का टुकड़ा देता और उस पर बैठ जाने को
कहता,पीड़ित को आराम मिल जाता। आगे किसी चाय के स्टाल पर आधी
चाय में आधा ठंडा पानी मिलाकर उसे पिलवा देता। मरीज को पेट दर्द और दस्त की समस्या
से छुटकारा मिल जाता।
हर दूसरे
तीसरे दिन बस का टायर फट जाना आम बात थी। स्टेपनी होती नहीं थी। होती तो वह भी
पंचर होती। यात्री किसी आने जाने वाले कि मोटर साइकिल पर बैठकर निकल जाते। जो
इंतजार कर सकते वे अगली किसी खटारा बस का इंतजार करते।
बरसात के
दौरान ऐसी ही एक यात्रा में बरोठा बस फिसलकर सड़क किनारे की काली मिट्टी में धंस
गई। यात्रियों ने खूब जोर लगाया। बात न बनी तो कंडक्टर ने कुछ गामीणों को भी बुला
लिया। कुछ सड़क चलते बंजारे भी धक्का लगाने में शामिल हो गए। बहुत मशक्कत के बाद
धुंआ करते हुए बस कीचड़ से निकल पाई। कंडक्टर की उदारता देखिए कि उसने उन पदयात्री
बंजारों को अपनी बस में जगह दे दी। वे बैठ भी गए। कंडक्टर उदार तो था पर अपनी
कम्पनी का वफादार भी। बंजारों से बोला 'आप लोग चार जने हो दो के ही पैसे दे
दो'।
मगर बंजारे भी
कहाँ पीछे रहने वाले थे। बोले 'उतार दो हमें बस से, पैसे तो नहीं हैं
हमारे पास।'
'क्या धंधा करते हो तुम लोग?' कंडक्टर ने पूछा।
'भैया सपेरे हैं हम। बीन बजाकर अपना और अपने सांपों का पेट पालते हैं!'
उनके ऐसा कहते
ही सभी यात्रियों के कान और आंख सक्रिय हो गए। सचमुच उन लोगों के पास पिटारे थे।
शायद सांप भी होंगे। सबको जैसे सांप सूंघ गया।
मगर कंडक्टर
को तो शायद रोज का अनुभव था। मुस्कुराते हुए बोला- 'चलो किराया न सही, बीन ही सुनवा दो साहब लोगों को।'
और सचमुच उन
सपेरों ने बरोठा आने तक खूब बीन बजाई। हम लोग सहमे सहमे सुनते रहे। मजबूरी थी।
हाँ, अब अवश्य कह सकता हूँ उस
दिन का बीन वादन 'नागिन' फ़िल्म के
प्रसिद्द गीत 'तन डोले..मेरा मन डोले' से
कम नहीं था।
जब भी कभी
ख्यात कार्टूनिस्ट मारियो, हमारे अपने इस्माइल लहरी जी और देवेंद्र शर्मा जी के विस्तृत दृश्यों,प्रसंगों वाले बड़े कार्टून चित्रों को देखता हूँ बरबस देहात जाने वाली
बसों के वे रोचक प्रसंग याद आने लगते हैं...
35
पुनः पधारें!
पिछली कड़ी में
मैंने देहात जाने वाली बसों के कुछ रोचक प्रसंगों का जिक्र किया है।
सामान्यतः बस
संचालक कम्पनी अपनी सबसे घटिया बसों को देहाती और ग्रामीण रास्तों पर चलाती थीं।
जब अच्छी सड़कों पर पूरी तरह उनका दोहन हो जाता, ग्रामीण रास्तों पर उन्हें धक्के
खाने के लिए उतार दिया जाता था।
इन खटारा बसों
के संचालन में आवश्यक कानूनी खाना पूर्तियों के लिए भी कई रास्ते निकाल लिए जाते
थे। इतनी सख्ती भी नहीं हुआ करती थी। राज्य सरकारें अपनी लोक परिवहन के शहरों के
संचालन में ही कठिनाई महसूस करती थीं तो देहात की बात सोचना तो किसी सपने से कम
नहीं था। अब तो राज्य परिवहन निगम का ही रूपांतरण हो गया है।
बहरहाल, देहात जाने वाली उन बसों
की हालत बहुत खस्ता हुआ करती थीं, धक्के लगाकर उसकी धड़कन को
स्टार्ट करना होता था, टायरों पर सैकड़ों टांके लगे होते थे,
बरसात में छत टपकती और लोग छाते खोलकर बैठते थे किंतु बस के भीतर
मूल्यों और आदर्शों के सितारे कलात्मक अक्षरों में लिखे हमेशा रोशन रहते थे।
बस के भीतर इन
सदवाक्यों और विचारों के साथ यात्रियों की जान माल की सुरक्षा की आत्मीय भावनाएं
भी हिदायतों व निर्देशों के रूप में जगमगाती रहती थीं।
बसों में लिखे
उन औचित्य हीन संदेशों, हिदायतों के अटपने पन को लेकर मैने एक पत्र पहले 'नईदुनिया'
में और बाद में शरद जोशी जी द्वारा संपादित 'हिंदी
एक्सप्रेस' में भेजा था। मेरे मित्र और शुभचिंतक भाई ओम
वर्मा जी ने उसे पढा तो कहने लगे- 'तुमने इस मुद्दे को इतने
छोटे में निपटा दिया। तुम्हे तो एक लम्बी व्यंग्य रचना लिखनी चाहिए।'
मैंने वह रचना
लिखी भी,किन्तु अधिक विस्तार नहीं दे सका। रचना पहले नईदुनिया में प्रकाशित हुई और
बाद में कई अन्य संग्रहों में शामिल हुई।
आकाशवाणी,इंदौर से उस वक्त के
श्रेष्ठ उद्घोषक श्री नरेन्द्र पंडित जी ने इसका बहुत दिलचस्प अंदाज में भावपूर्ण
वाचन किया था। उनके उस पाठ से व्यंग्य वार्ता पढ़ने की मेरी समझ भी बढ़ी।
इसी विनोद
वार्ता के शीर्षक से वर्ष 1995 में मेरा पहला व्यंग्य संग्रह दिशा प्रकाशन,दिल्ली
से आया। मेरी अति प्रिय रचना 'सफर में समाधि' की इस पूरक व्यंग्य रचना 'पुनः पधारें' को यहां दे रहा, चाहें तो पढ़ लीजिए...
व्यंग्य
पुनः पधारें!
ब्रजेश
कानूनगो
शादियों के
मौसम में देहात जाने वाली बस में यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. बस पर लिखा ‘प्रवेश द्वार’ देखकर मैं उसकी ओर बढ़ने और चढ़ने का प्रयास करता, मगर
अंदर से उतर रहे यात्रियों द्वारा फिर बाहर धकेल दिया जाता. निगाह पलट कर देखा तो ‘निर्गम द्वार’ से यात्री बस में चढ़ रहे थे और ‘प्रवेश द्वार’ से उतर रहे थे. अब बताइए दरवाजे पर
प्रवेश या निर्गम लिखने का क्या औचित्य रहा.
जैसे तैसे
अपने हाथ में अटैची थामें प्रवेश के लिए प्रयत्न करने लगा तो क्लीनर बोला- ‘बाबूजी बैठने की जगह तो है
नहीं ये सामान आप किधर ले जा रहे हो.’ और उसने अटैची को एक
झटका दिया और बस की छत पर पहुंचा दिया. वहां शायद दूसरे किसी व्यक्ति ने किसी
प्रतिभावान विकेट कीपर की तरह उसे लपक लिया था.
इस बीच मैं बस
के अंदर पहुंचा दिया जा चुका था. अंदर पहुंच कर सामने खिड़की पर लिखा देखा ‘फलाना बस सर्विस आपका
हार्दिक स्वागत करती है’. मगर मेरा ‘धन्यवाद’
सुनने के लिए वहां कोई नहीं था, बल्कि स्वयं
बस वालों की तरफ से एक स्थान पर ‘धन्यवाद’ लिखा हुआ था.
बस में ‘अपने सामान की जिम्मेदारी
स्वयं रखें’ लिखा देख मैं ऊपर से नीचे तक कांप गया. मेरी अटैची
जिस अधिकार से क्लीनर ने छत पर पहुंचा दी थी, उसे पुनः
लौटाने की उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी, उसमें रखा कीमती
सामान खो जाता है तो यह सब मेरे अपनी गैर जिम्मेदारी से हुआ होता.
थोड़ी देर बाद
वही क्लीनर यात्रियों को आगे धकेलता उन्हें तरतीब से सेट करता जा रहा था. देखते ही
देखते मैं खिसकता हुआ बोनट तक पहुंच गया. वहां स्थान इतना कम था कि मैं न तो ठीक
से खड़ा हो सकता था, नहीं बैठ सकता था. ऊपर से पकड़ने का पाइप वहां आते-आते समाप्त हो चुका था.
क्लीनर ने हल्का सा झटका दिया तो मैं बोनट पर जा टिका. जहां पहले ही तीन यात्री
टिके हुए थे. मोटे अक्षरों में वहां स्पष्ट लिखा था ‘बोनट पर
बैठना सख्त मना है.’
बस पूरी
रफ़्तार से दौड़ने लगी थी. मौसम ठंडा होने लगा तो ड्राइवर ने अपने कान में खुसी बीडी
जलाकर अपने मुंह से लगा ली. ड्राइवर की सीट के ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था ‘धूम्रपान वर्जित है’.
माचिस प्रदाता
और ड्राइवर के बीच देश की राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं पर
चर्चाएं होने लगी. इस चर्चा ने ड्राइवर को गरमा दिया और अब वह दोनों हाथ हिला हिला
कर, स्टेयरिंग ठोक ठोक कर वार्तालाप करने लगा. तभी मेरी
दृष्टि सामने वाले कांच पर लिखे शुभ वाक्य पर पड़ी- ‘ईश्वर
आपकी यात्रा सफल करें’.
इस बीच बस की
छत मामूली बरसात के कारण ही टपकने लगी थी. मुझे बस वालों पर क्षोभ होने लगा कि
उन्होंने ‘बस में भरी बंदूक लेकर न बैठने’ की बजाय ‘बस में छाता लेकर ही बैठें ’ जैसी हिदायत क्यों नहीं
लिखवाई.
अचानक बस रुक
रुक गई. बस के सामने एक भैंस आ गई थी. जिस तरह प्रतिपक्ष सदन से बहिष्कार किया
करता है, उसी तरह से भैसें अक्सर चलती बस के सामने आ जाया करती हैं. सदन से वाक आउट
करना प्रतिपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है, सड़क पर धरना देना
भैसों का प्राकृतिक हक है।
बहरहाल अचानक
लगाए गए ब्रेक के कारण तीसरे नंबर की सीट पर ऊंघती महिला का सिर आगे वाली सीट से
जा टकराया और माथे से खून बहने लगा. तभी मेरी निगाह कंडक्टर सीट के ऊपर ‘फर्स्ट एड बॉक्स’ पर पड़ी और मैं दवाइयां निकालने के लिए उठा भी मगर उसमें से दवाई की खाली
शीशियां तथा ग्रिस में डूबा कॉटन निकला.
तीन घंटे की
यात्रा के बाद मेरा गंतव्य आ गया था. मैं उतरने के लिए जैसे उद्यत हुआ 'निर्गम द्वार' के ठीक ऊपर लिखा देखा- ‘पुनः पधारें!’...
ब्रजेश
कानूनगो