Saturday, 24 October 2020

स्वान्तः सुखाय 58 महाअष्टमी : प्रसाद भोग व धूप

स्वान्तः सुखाय 58

महाअष्टमी : प्रसाद भोग व धूप 


दशहरे के पूर्व आने वाली महाअष्टमी का कुटुंब में बड़ा महत्व हुआ करता था। परिवार के छोटे बड़े जो भी सदस्य नौकरी या पढ़ाई आदि के सिलसिले में बाहर होते थे उन्हें भी एक तरह से महाअष्टमी के दिन घर आना जरूरी होता था। यह एक परंपरा सी बनी हुई थी। दशहरे या दिवाली पर यदि न आ सकें तो एक बार स्वीकार्य होता किन्तु 'माता पूजन' के प्रसाद की धूप देने के लिए परिवार के हर सदस्य का उपस्थित होना जरूरी होता था। 

इस बहाने अबोले में चल रहे सगे संबंधियों में पुनः संवाद शुरू होने की गुंजाइश भी रहती थी। भले मतभेद बने रहते किन्तु मनभेद थोड़े कम हो जाया करते थे।

 

माता का प्रसाद बनना और पूजन आदि भी उसी घर में होता था जहां परिवार के मुखिया का निवास होता। बोलचाल में उसे 'बड़ा घर' कहते। बड़े घर पर सब इकट्ठा होकर पूजन,भोजन आदि एक साथ करते थे।


हमारे यहां भी ऐसा ही होता था। इसके अलावा कई बार हमारे नाना व नानी का भी स्नेह सानिध्य हमे मिल जाता था। दरअसल, उन्होंने किसी कठिन क्षण में यह मानता या संकल्प ले लिया था कि हर वर्ष नवरात्रि का समय चामुंडा की नगरी देवास में ही गुजारेंगे। पूरी नवरात्रि और दशहरे तक वे यहां रहते तो घर में बड़ी चहल पहल बनी रहती। नाते रिश्तेदार भी उनसे मिलने जुलने आते। कुटुंब में नए सगाई संबंधों और रिश्तों के सूत्र खोजने में उनकी बड़ी मदद रहती थी। 


नौकरी में मैं जब भी बाहर रहा महाअष्टमी के दिन माँ के पास देवास आ ही जाता था। कुटुंब के कई परिवारों में तो प्रसाद के बनने की बड़ी कठिन व्यवस्था होती थी। घर की घट्टी पर अनाज पीसा जाता था। बनता हुआ भोग कोई अन्य व्यक्ति देख नहीं सकता था। स्वयं घर की महिलाएं ही प्रसाद भोग की तैयारी कर बनातीं थीं। 

हमारी दादी अधिक कट्टर नहीं थीं,उन्होंने माँ को भी रियायतें दे रखीं थी। जमाने के हिसाब से जो सहजता से संभव हो वह करने की छूट मिल गई थी। बाद में पत्नी को भी यह रियायत प्राप्त हो गई। 

हाँ, इतना अवश्य था कि प्रसाद में भेल नहीं करना होता है, जैसे पकोड़ी सिर्फ बेसन की बनेगी,उसमें हरी मिर्च और प्याज नहीं पड़ेगा। पूरियों में नमक नहीं डलेगा। इसके पीछे का तथ्य मुझे अब तक समझ नहीं आया।

यह भी दिलचस्प है कि बिना भेल का भोग लगाने वाले हमारे परिवार में अष्टमी की धूप अष्टमी-नवमी के भेल समय में दी जाने की परंपरा है। सबके यहां अष्टमी की दोपहर भोग लगता है हमारे यहां गोधूलि बेला में।


प्रतिवर्ष अष्टमी के दिन प्रातः देवास की बड़ी माता तुलजा भवानी मंदिर में कभी दादाजी नियमित हवन करवाया करते थे। बाद में पिताजी उस दिन नारियल व पूजा सामग्री चढ़ाकर आते रहे। बाद में स्थानीय भाई आदि यह जिम्मेदारी निभाने लगे। 


अब तो कुटुंब में सामूहिक पूजन कभी कभार ही सम्भव हो पाता है।  इकट्ठा होने की वह परम्परा निभाई जाने की स्थितियां वैसी नहीं रहीं।

हालांकि भोग अब भी लगता है, माता को धूप भी दी जाती है। पात्र में उठती अग्नि और धूम्र का चित्र वाट्सएप पर शेयर हो जाता है। परदेस में बैठे बच्चे अगली सुबह जागने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके प्रणाम कर लेते हैं....


ब्रजेश कानूनगो

स्वान्तः सुखाय 57 चामुंडा पहाड़ी से स्मृतियों का फ्लैशबैक

स्वान्तः सुखाय 57

चामुंडा पहाड़ी से स्मृतियों का फ्लैशबैक

नवरात्रि को लेकर संस्मरण लिखते वक्त अचानक मुझे मेरे सहपाठी और बाद में बैंक में मेरे साथी भीमराज स्वामी की याद हो आई। कुछ वर्ष पूर्व ही वे सेवानिवृत्त होकर स्थायी रूप से इंदौर आ गए हैं। प्रत्यक्ष मुलाकात तो हाल फिलहाल सम्भव नही हुई है किंतु  कुछ समय पहले की उनकी कही एक बात याद आ गई। उन्होंने स्कूल के दिनों को याद करते हुए कहा था- ' ब्रजेश तुम कक्षा के ब्लैकबोर्ड पर कितनी जल्दी और सुंदर चामुंडा माता की तस्वीर चॉक से बना दिया करते थे।' मुझे तो याद ही नही था किंतु उनके याद दिलाने पर जैसे आज पुनः सब कुछ याद आने लगा है।

छठी कक्षा से लेकर आठवी कक्षा तक की पढ़ाई हमने जिस स्कूल में की थी उस सरकारी मिडिल स्कूल को 'नई बिल्डिंग स्कूल' के नाम से ही जाना जाता था। यकीनन वह बिल्कुल नया ही बना था। पूरे प्रदेश में उसी डिजाइन के स्कूल भवन बनने लगे थे। आज भी लगभग उसी पैटर्न में याने अंग्रेजी के 'एच' आकार में बनते हैं,इससे सुविधा यह रहती है कि हर मौसम में पूरे स्कूल के हर कमरे में सुगमता से आया जाया जा सकता है।

इस स्कूल की खासियत इसकी खास लोकेशन भी थी। पास में शहर के महाविद्यालय तो थे ही लेकिन इस बिल्डिंग से लगा हुआ ही एक खेल का मैदान भी था,जिसे 'ओलंपिक ग्राउंड' कहा जाता था। बिल्डिंग से लगी हुई एक तलैया सी थी,जिसमे बरसात में पानी भरा रहता। उसमें पत्थरों की कत्तलें सनसनाते तैराने में हम बच्चों को बड़ा मजा आया करता था। इसी तलैया के पीछे राजा महाराजाओं की समाधियां थीं, जहां बहुत खूबसूरत छतरियाँ बनाकर शिवलिंग स्थापित किये गए थे। इसे छत्री बाग कहा जाता था। इससे जुड़ा देवास का बहुत सुंदर 'मीठा तालाब' था। मीठे तालाब में कमल खिला करते थे।

स्कूल के पास बल्कि स्कूल प्रांगण के भीतर तक पुराना लेकिन उपयोग में नहीं आ रहा कब्रिस्तान भी था। इन पुरानी कब्रों पर पेड़ की छाया में बैठकर छुट्टी के बीच हम दोस्त हंसी मजाक करते रहते थे। कोई भय नहीं लगता था।इतनी बात इसलिए कही कि इन्हीं कक्षाओं में पढ़ते हुए हमारी कई रुचियाँ उभरने लगीं थीं। बहुत से मित्रों में जो दो मुझे खास तौर से याद आ रहे। उनमे एक भीमराज स्वामी तो हैं ही दूसरे मित्र थे शेखर पागे। 

भीमराज मूलतः दक्षिण भारत के होते हुए भी मालवी व्यक्ति हैं। उनके जन्म से लेकर पालन पोषण,पढाई सब कुछ इधर देवास मालवा में ही हुआ था। उन्हें तमिल नहीं आती। मित्रों के परिजनों से मालवी में बढ़िया बतिया लेते हैं। नौकरी के दौरान उनके प्रमोशन पर गलतफहमी में उनका ट्रांसफर जब चैनई करके प्रबन्धन ने उनका भला करना चाहा तो वे घबरा गए। बहुत मुश्किल से मैनेजमेंट को गले उतारना पड़ा कि स्वामीजी ठेठ मालवी और हिंदी भाषी व्यक्ति हैं। ओलम्पिक ग्राउंड पर होने वाले खेलों खासकर फुटबॉल व  क्रिकेट देखते,खेलते हुए भीमराज प्रतिभाशाली क्रिकेटर बने और आगे चलकर कई टूर्नामेंट्स में विक्रम विश्वविद्यालय की टीम का प्रतिनिधित्व व टीम का नेतृत्व भी किया।

ऐसे ही शेखर पागे स्कूल में मौलिक कविताएं लिखा करते थे। खूब पढ़ने लिखने वाले बुद्धिमान किस्म के विद्यार्थी थे। मैंने उन पर कविता की कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं-' शेखर पागे एक कवि हैं,कुछ दुबले कुछ पतले से!' शेखर के सानिध्य में शायद कविता आदि करने का कोई वायरस प्रवेश किया होगा ,ऐसा मुझे अब भी लगता रहता है। शेखर पागे से प्रत्यक्ष मिले बरसों हो गए हैं। कोरोना स्थितियां सामान्य होने पर अवश्य मिलने की कोशिश होगी।

बहरहाल, बात तो चामुंडा माता और देवास टेकरी की ही हो रही है। जैसा मैंने पहले की कड़ियों में कहा भी है कि देवास की टेकरी एक ऐसा डेस्टिनेशन है जहां शहर के निवासी ही नहीं बाहर से आए मेहमान की भी वहां की सैर के लिए रुचि जागृत हो ही जाती है। पहाड़ी पर पहुंचकर नीचे के दृश्य को निहारना बहुत कुतूहल पैदा करता है। भोपाल, ग्वालियर,उज्जैन,इंदौर की ओर जाने वाली सड़कें शहर से दूर जाते जाते बारीक लकीरों में बदलती दिखाई देते हुए विलीन हो जाती है... इंदौर से उज्जैन की दिशा में आने जाने वाली रेल गाड़ियों को घुमावदार पटरियों पर रेंगते हम लोग बरसों से देखकर रोमांचित होते रहे हैं। सबसे ऊंचे पीपल के पेड़ से बचपन के मोहल्ले के पुश्तैनी घर को पहचान कर हम लोग उंगली के इशारे से मेहमानों को बताकर अद्भुत खुशी को आज भी महसूस कर पाते हैं। मीठा तालाब और छत्री बाग के सुंदर दृश्य मन को मोह लेते हैं। टेकरी पर सात कुंड और कुछ में सुंदर मछलियों की अठखेलियां, दमदमे (हिल टॉप) पर खड़ा विजय स्तम्भ, सूखी हुई दूध तलाई और उसके सूख जाने की किवदंती। क्या कुछ याद नहीं आ रहा।

जन्माष्टमी पर टेकरी स्थित राजकीय तोप घर से तोप का बाहर निकलकर आना और 21 तोपों की भगवान को सलामी। अब तो इस तोपखाने के नजदीक  ख़ूबसूरत और शांत जैन मंदिर का नव निर्माण हो गया है।  

पुराने शहर के दूसरी तरफ वाले दृश्य में बैंक नोट प्रेस, पुलिस परेड ग्राउंड, सबसे पुरानी फेक्ट्री गाजरा गियर्स और स्टील ट्यूब्स आदि। एरिना जिसमें कई कुश्तियां लड़ी गईं। ओह!! क्या क्या याद करें.….

चामुंडा माता की प्रतिमा में अलग अलग रूप नजर आने की दन्त कथाएं भी खूब प्रचलित रहीं हैं। हमें भी लगता था जैसे प्रतिमा में सुबह किसी बच्चे की मासूमियत, दोपहर में किसी युवती सा उत्साह और शाम को प्रौढ़ता का गाम्भीर्य दमकने लगता है।

देवी की हमारी समझ का बाद में और विस्तार हुआ।  स्त्री के वे भिन्न स्वरूप हमें अन्यत्र भी दिखाई देने लगे....लगा जैसे वह प्रतिमा तो सर्व व्यापी है...कई जगह अलग अलग स्वरूपों में दिखाई देने लगती हैं।

एक कविता यहां पढ़ें जो कुछ वर्ष पूर्व लिखी थी..


कविता

देवी मंदिर में

ब्रजेश कानूनगो


श्रीमानजी !

आप बहुत भाग्यशाली हैं

जो पधारें हैं माता मंदिर


सुबह बच्ची

दोपहर युवती

शाम को औरत का

रूप धरती है चमत्कारी प्रतिमा


धन्यवाद पंडित जी! 

सच तो यह है कि

फूल-पत्तों, धरती-आकाश

हर जगह दिख जाता है अक्सर

देवी का यह अद्भुत रूप मुझे


एक देवी चहक उठती है सुबह-सुबह   

थकान को हर लेती दूसरी

एक का नेह भरा हाथ

विश्वास से भर देता है हर शाम        


क्षमा करें

भीतर नगाड़े सा कुछ बजने लगा है

मुझे घर लौटना चाहिए अब.


(रचनाकाल: 2016)


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ब्रजेश कानूनगो

स्वान्तः सुखाय 56 चलो बुलावा आया है…..

स्वान्तः सुखाय 56

चलो बुलावा आया है…..


नवरात्रि के समय  वैसे तो पूरा देश बहुत उल्लास और पूजा आराधना से सराबोर रहता है किंतु जिन शहर कस्बों आदि में किसी देवी का मंदिर या स्थान होता है वहां का समूचा वातावरण ही 'मातामय' हो जाता है। बड़ी धूमधाम बनी रहती है।

आमतौर पर जहां देवी मंदिर किसी पहाड़ी पर स्थित होता है,वहां की रौनक देखते ही बनती है। जत्रा, मेले आदि भी इन दिनों खूब सजते हैं और लोग त्योहारों और पर्व का खूब आनन्द उठाते हैं। मेरे गृहनगर देवास की भी यही विशेषता रही है। बचपन से ही सुनते रहे कि  इस सांस्कृतिक नगरी का नाम 'देवास' भी 'देवताओं के वास' की वजह से ही पड़ा है। लगभग 300 फुट ऊंची पहाड़ी पर देवी चामुंडा और देवी तुलजा भवानी के मंदिर स्थित होने से इस पहाड़ी को 'माताजी की टेकरी' ही कहा जाता है। बाद में ब्रिटिश इतिहासकार ईएम फॉस्टर ने अपनी पुस्तक 'हिल ऑफ देवी' में भी देवास का उल्लेख किया है। 

शहर के स्त्री,पुरुष, युवा सभी नित्य ही बारहों महीने सुबह शाम इस पहाड़ी पर भ्रमण के लिए जाते हैं। बचपन में परिवार के बड़े बूढ़े बच्चों को सुबह शाम की सैर के लिए टेकरी पर नियमित जाने को कहते थे। खासतौर से टेकरी पर जाना दैनिक वर्जिश का प्रमुख हिस्सा होता था। 

देवास की टेकरी पर जाने के उस वक्त दो रास्ते हुआ करते थे। एक खड़ी रपट थी जो पश्चिम क्षेत्र के रेलवे स्टेशन की ओर से ऊपर जाती है। इसी के मोहक मुहाने पर आज भी शास्त्रीय गायक पद्मविभूषण प. कुमार गंधर्व जी का निवास 'भानुकुल' स्थित है। दूसरा रास्ता सीढ़ियों का  था जो काले पत्थरों से निर्मित था, बीच में कुछ जगह कच्ची रपट भी हुआ करती थीं। कुछ अन्य रोमांचक पैदल रास्ते बच्चों और युवाओं ने खोज निकाला थे। इन रास्तों से होकर पहाड़ी के ऊपर तक पहुंचने को 'खड़े पहाड़ चढ़ना' बोला जाता था। पेरेंट्स बच्चों को अक्सर हिदायत देते थे कि जाओ मगर खड़े पहाड़ मत चढ़ना। हम लोग हामी जरूर भरते थे 'नहीं चढ़ेंगे' किंतु करते इसके ठीक विपरीत  टेकरी पर 'खड़े पहाड़'  चढ़ने का ही जोखिम उठाते। 

सीढ़ियों वाले रास्ते से जाने का भी अपना अलग रोमांच था। एक तो वह हमारे मुहल्ले से बहुत नजदीक था। दौड़ते दौड़ते टेकरी के सीढ़ियों वाले रास्ते पर पहुंच जाते थे। सीढ़ियों को भी दौड़ते हुए चढ़ जाया करते। सीढ़ियों की गिनती करते। अब तो याद नहीं रही उस वक्त की सीढ़ियों की संख्या। बीच में कच्ची रपट भी थी। इसी के किनारे एक जगह पत्थर गिरा करते थे। यहां की कच्ची चट्टान की खास विशेषता यह थी कि इसकी बजरी को जब पानी भरे पात्र में डालते तो उसमें से सनसनाहट की आवाज  निकलती और हवा के बुलबुले निकलते थे। बहुत मजा आता था ऐसा करते हुए। इसी जगह गिरे हुए पत्थरों को जोड़कर घर नुमा कुछ बनाते। मान्यता थी कि माताजी उनके सपनों के आशियाने का सपना पूरा करेंगीं। 

देवास पहाड़ी की चट्टानों में कई जगह सफेद चमकती रंगोली सी दिखाई देती है। यह सम्भवतः अभ्रक खनिज है,कुछ लोग रंगोली पत्थर भी कहते हैं।

सीढ़ियां चढ़ने के बाद पूरी टेकरी पर परिक्रमा मार्ग है। जिस पर चलते हुए पुराने शहर और नए देवास का नजारा किया जा सकता है। पैदल सीढ़ियां देवी चामुंडा (छोटी माता) और जीप आदि वाला रपट मार्ग देवी तुलजा भवानी (बड़ी माता) के चरणों तक पहुंचता है।

कुछ दिलचस्प बातें याद आती हैं। चामुंडा माता मंदिर के ठीक सामने पत्थर का एक भारी गोला पड़ा होता था, मन्दिर प्रवेश से पूर्व जिसे कुछ भक्त अपने हाथों से बहुत मुश्किल से उठाकर कन्धे पर रखते और फिर उसे धरती पर पटकने के बाद चौखट पर मत्था टेक दर्शन के लिए प्रवेश करते थे। जोखिम भरा यह काम हर कोई नहीं कर पाता था। लेकिन जिसे यह कला आ जाती थी वह बहुत सहजता से भारी पत्थर उठाकर क्षण में धरती पर पटक देता था। हमारे पड़ोस के उस वक्त के 60/ 65 वर्षीय वृद्ध 'वल्लभ जी' जिन्हें हम 'बल्ला बा' कहते थे सहजता से यह करिश्मा करके सबको चकित कर देते थे। अब यह पत्थर का गोला शायद नहीं है वहां। किसी ने बताया था, वह नीचे खाई में गिराया जा चुका है।

खड़े पहाड़ चढ़ने के कई रास्ते अब सीढ़ियों में बदल गए हैं। खासतौर से शीलनाथ धूनी वाला एरिना (अखाड़ा) मार्ग। निराले नेता पोल साहब के निराले घोषणापत्र में उस समय के मजाकिया आश्वासन ने साकार रूप ले लिया है। अब टेकरी पर 'रोप वे' की सहायता से भी पहुंच कर माताजी के दर्शन किये जा सकते हैं।

और जो देवास में न हैं उन्हें तो किसी भी रास्ते पर पैदल चलने की जरूरत नहीं पड़ती। पंख लगे होते हैं मन पर...जहां चाहे पहुंच ही जाता है...

आइये यहां मेरी पहली कविता पढ़ लेते हैं....


कविता

अस्पताल की खिडकी से


कैसा होगा वहाँ ?

दूर दिखाई देती पहाडी के पीछे

सूरज निकलता है रोज जहाँ से


एक नदी होगी शायद

झरना भी हो सकता है

जो गिरता होगा पहाडी के ऊपर से

धरती पर गहरा गड्ढा हो गया होगा

पिकनिक मनाने आए बच्चों को

उधर जाने से रोक रहे होंगे दादाजी हाँक लगाते हुए


धान का खेत होगा पहाडी के पीछे

सतरंगे वस्त्रों को कमर में खोंसकर औरतें

रोप रहीं होंगी हरे पत्तेदार पौधे

गुनगुनाते हुए


देवी का मन्दिर होगा पहाडी की चोटी पर

तलहटी से सैकडों सीढियाँ पहुंचती होंगी वहाँ

एक दीप स्तम्भ होगा

और रात को रोशनी बिखर जाती होगी चारों ओर

एक बडा घंटा कुछ नगाडे रखे होंगे

आरती के वक्त बजाया जाता होगा जिन्हे


सडक बन रही होगी

काली टंकियों में पिघल रहा होगा तारकोल

चक्के पर घूम रहे डमरू में खडखडा रही होगी गिट्टियाँ

रोड रोलर के इंजिन की आवाज बदल रही होगी लोरी में

बबूल की छाया में बंधी झोली में सो रहा होगा कोई बच्चा

शोरगुल के बीच 


तमाम जीवित ध्वनियाँ उपस्थित होंगी वहाँ

जो नहीं है अस्पताल में खिडकी के पास लगे पलंग के आस-पास । 


(रचनाकाल :1995)


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(टेकरी की कुछ और यादें आगे...)


ब्रजेश कानूनगो

Saturday, 10 October 2020

स्वान्तः सुखाय 55 देशज को बचाने में चिंतित मालवी मनक : नरहरि पटेल

स्वान्तः सुखाय 55

देशज को बचाने में चिंतित मालवी मनक : नरहरि पटेल


उस दिन रविवार था। हमारे लिए वह खास दिन जब सामान्यतः अखबारों में 'साहित्य पृष्ठ' का प्रकाशन किया जाता रहा है। अब ऐसा नहीं है। या तो उस तरह के पृष्ठ अब रहे नहीं या फिर वहां साहित्य नहीं रहा। कुछ अपवाद हो सकते हैं किंतु उस दिन रविवार ही हो यह जरूरी भी नहीं।


तो उस दिन रविवार था और सुबह सुबह अखबार में छपी अपनी कविता का पुनर्पाठ कर ही रहा था कि मोबाइल में अन सेव्ड नम्बर से काल आया।


'बधाई ब्रजेश भाई! क्या खूब लिखा है आपने...मन प्रसन्न हो गया...अब तो उस अनुभूति को समझने वाले लोग ही नहीं रहे...कौन देखता है अब किसी कुतिया को इस तरह...नीम के नीचे जमीन खुरचकर खो बनाते...पिल्लों का धूप में खेलना और ठंड में एक दूसरे में कम्बल की तरह गुंथ जाना...!'

उधर से यह सब हिंदी, मालवी में बहुत आत्मीयता से कहा जा रहा था। मालवी व्यक्ति होते हुए मालवी भाषा मेरी रफत में नहीं रही, खड़ी बोली का व्यक्ति हूँ अतः सामने से आ रही उस मीठी मालवी और उस रस को यहां शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल हो रहा है। 


यह भी निश्चित है कि जैसे ही मैं यहां यह बताऊंगा कि उधर से आने वाला यह उत्साहवर्धक आत्मीय फोन आदरणीय दादा नरहरि पटेल जी का था तो बहुत से लोगों को वे साक्षात अपनी शैली में प्रत्यक्ष बतियाते नजर आने लगेंगे।


दादा नरहरि पटेल जी को मैं लोक संस्कृति के बड़े जानकार, मालवी,निमाड़ी भाषा और परंपराओं से आत्मसात सुकवि, रंगकर्मी के रूप में भाषा और लोकजीवन में देशज पहचान को मिटते देखकर दुःखी और चिंतित रहने वाले संवेदनशील व्यक्ति के रूप में जानता रहा हूँ। इन्ही सब प्रयासों में उनके कार्य देखे जा सकते हैं। वह चाहे उनकी कविता हो,  नाट्यवाचन या अभिनय हो, वार्तालाप हो,व्याख्यान हो,संवाद हो या अभिव्यक्ति का अन्य कोई स्वरूप रहा हो। उनकी उसी खास रचनात्मक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया जा सकता है। एक प्रतिबद्धता उनकी अपने युवाकाल से प्रगतिशील लेखक संघ से भी रही और उस जमाने के साहित्यकारों के साथ उन्होंने बहुत काम भी किया। एक सुखद सत्य यह भी है कि जब 1957 में मैं जब इस संसार में आ रहा था उस वक्त इंदौर आकाशवाणी केंद्र ने भी जन्म लिया। तब से ही दादा नरहरि पटेल रेडियो के श्रेष्ठ कलाकारों में शामिल रहे और आज 86 वर्ष की आयु में हम उनकी इस प्रतिभा का लाभ लेते रहते हैं... 


बहरहाल, जब भी मैंने किसी देशज और लुप्त होती बात या प्रसंग का उल्लेख अपनी किसी रचना में किया तब उनका एक फोन मुझ तक अवश्य पहुंचा। बड़ी देर तक वे स्वयं उस बहाने अपनी पीड़ा के साथ उस खुशी और आनन्द का अहसास भी कराते हैं जो उस देशज प्रयोग से संभव हो जाती है।


'मालवी जाजम' उनका एक ऐसा उपक्रम रहा है जिसमें वे मालवी बोली,संस्कृति को बचाए रखने के लिए नियमित बैठक करते रहते हैं। यह बहुत सुखद है कि उनके इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए एक पूरी टीम उनके मार्गदर्शन में तैयार हो गई है। उनके सुयोग्य पुत्र भाई संजय पटेल में उनके व्यक्तित्व और सुकर्मों की छवि स्पष्ट दिखाई देती है।


एक दो बार मुझे भी 'जाजम' में शिरकत करने का सौभाग्य मिला। गोष्ठी की अपनी खास पहचान है जिसमें लोकगीतों से लेकर साहित्य की सभी विधा में मालवी रचनाएं सुनाई और गाई जाती हैं। उनके ऐसे प्रयासों में श्री प्रह्लादसिंह टिपानिया जी सहित कई ख्यात कलाकारों को भी गौरव मिलता रहा है। 


मेरी कविता 'चिड़िया का सितार' पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जैसे वे भावुक ही हो गए। बाद में पूरा संग्रह पढ़कर इत्मिनान से मेरा हौसला बढ़ाया। मैं धन्य हो गया उनका आशीष पा कर। लिखना सफल हुआ।


वरिष्ठ समाजसेवी व बैंक अधिकारी नेता श्री आलोक खरे जी के संयोजन में हमारे प्रकल्प 'समाज सेवा प्रकोष्ठ' द्वारा संयोजित तंगबस्ती के गरीब बच्चों के शिविर में जब एक बार उन्होंने बच्चों से बातचीत की,कविताएं सुनाई तो बच्चों को वह सब इतना भाया कि बाद में भी कई मौकों पर उन्हें शिरकत करनी पड़ी। 

कविता और गीतों की वे इतनी रोचक और भावभंगिमाओं के साथ प्रस्तुति देते हैं कि दर्शक, श्रोता मुग्ध तो होते ही हैं बल्कि  लोककाव्य और लोक संस्कृति का सीधा असर हृदय के भीतर तक महसूस किया जाने लगता है।


सच तो यह है कि दादा नरहरि पटेल जी को ठीक से जानना समझना है तो उनको आमने सामने बैठकर रचना पाठ करते,नाट्यवाचन या अभिनय करते देखना बहुत जरूरी होगा।


दादा के स्वस्थ और सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ यहां उनका एक मालवी गीत पढ़ते हैं...कल्पना में उनको सामने महसूस जरूर करें...


मालवी गीत

नरहरि पटेल


कसा चेहकता था चेरकला कई याद हे के नी याद हे।

मस्ती में गम्मत रतजगा कई याद हे के नी याद है।


दादी की मीठी लोरियाँ नानी की रेशम झोरियाँ।

माँ की कसूमल थपकियाँ कई याद हे के नी याद हे।


होली दिवाली थी कसी राखी पे मनवाराँ कसी

घूमर दिवासा ढुमकणा कई याद हे के नी याद हे।


थानक पे माँगी थी मन्नताँ बस एक बालूड़ो दे माँ

माता की पूजा वंदना कई याद हे के नी याद हे।


सूरज उगाता था कूकड़ा संजा सुलाती थी रूँखड़ा

राताँ का चमचम चूड़ला कई याद हे के नी याद हे।


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ब्रजेश कानूनगो

Friday, 9 October 2020

स्वान्तः सुखाय 54 जिंदाबाद आकाशवाणी !!

स्वान्तः सुखाय 54  

जिंदाबाद आकाशवाणी !!


कॉलेज के दिनों में विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई (शायद 1974) के समय अखबार में आकाशवाणी,इंदौर के लिए उद्घोषक की नियुक्ति के लिए विज्ञप्ति निकली थी। मन में रेडियो पर बोलने का सपना उस वक्त बहुत से रचनात्मक युवकों को आकर्षित करता था। 

यद्यपि आकाशवाणी का इंदौर केंद्र गृह नगर देवास से बस 35 किलोमीटर की दूरी पर ही था किंतु तब तक कभी अवसर मिला नहीं था। 


उद्घोषक के लिए विज्ञप्ति देखी तो मन में गुब्बारे से फूटने लगे। देवास के पंडित परिवार से हमारे पारिवारिक संबंध रहे थे। छोटी जगह या कस्बे में सभी एक तरह से उस वक्त रिश्तेदार की तरह ही माने जाते थे। गांव भाई और गांव काका आदि की परम्परा में सब अपने ही होते हैं। इसी परंपरा में देवास मूल के श्री नरेन्द्र पंडित हमारे काका की तरह ही थे।

अब यह बताना जरूरी भी नहीं कि श्री नरेन्द्र पंडित देवास के होकर आकाशवाणी इंदौर पर वरिष्ठ उद्घोषक, प्रोग्राम डायरेक्टर और केंद्र निदेशक तक रहे। वे संगीत और रंगकर्म में भी बहुत प्रतिभा सम्पन्न थे।


हमारी ख्वाहिश के बारे में हमारे काकाश्री ने पंडित जी को बताया और उनका मशविरा लिया। पंडित जी ने परिवार के किसी बड़े सदस्य की तरह ही राय दी कि अभी हमें अनाउंसर जैसी नौकरी का न सोचकर अपनी आगे की पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करके देवास के औद्योगिक क्षेत्र में वैज्ञानिक के तौर पर बड़ी नौकरी के लिए कोशिश करना चाहिए। रेडियो आदि पर प्रस्तुति का सपना तो अन्य नौकरी करते हुए भी पूरा किया जा सकता है।

और बाद में हुआ भी यही। हम वैज्ञानिक तो नही बन सके किन्तु बैंक में क्लर्क जरूर बन गए। बैंक राष्ट्रीयकरण का दौर था। खूब भर्तियां हो रहीं थीं। वैज्ञानिक ही क्या इंजीनियर  और संभावित आईएएस तक बैंकों में चले गए। यह अलग बात है कि रुचिवान लोगों ने वहां रहकर भी अपने रचनात्मक शौक पूरे करने के अवसर तलाश ही लिए।  


'आई' कहानी के प्रसारण के बाद आकाशवाणी के इंदौर केंद्र से रचनाओं को प्रसारित करने के अवसर बाद में मिलते ही रहे। पहले अंतराल कम होता था,बाद में बुलावे का अंतराल बढ़ता गया। अब तो दो तीन साल में किसी स्नेही को याद आ जाती है।


आकाशवाणी पर जाकर वहां प्रसारण करने के भी बहुत से ऐसे प्रसंग हैं जिनकी स्मृति सुख देती रहती हैं। 'खेती गृहस्थी' में नन्दा जी और भैराजी की उपस्थिति में जाजम पर स्क्रिप्ट फैलाकर बैठना। वार्ता के आलेख को प्रश्नोत्तरी में बदल कर प्रस्तुत करना। हर पेरा के पहले नंदा जी और भैरा जी का प्रश्न। कान्हा जी थोड़ा बाद में आए थे। मुझे याद आ रहा... वह मेरा एक रम्य लेख था-'नामकरण मनोविज्ञान'। आज जब आकाशवाणी के उन लीजेंड्स के साथ फर्श पर बैठकर प्रस्तुति की कल्पना करता हूँ,रोमांच की अनुभूति से भर उठता हूँ।


एक विनोद वार्ता 'सफर में समाधि' मुझे खुद पढ़ना थी किन्तु नरेंद्र पंडित जी को इतना पसंद आई कि वह वार्ता उन्होंने स्वयं अपनी आवाज में पढी। उनके वाचन से मैने विनोद वार्ता पढ़ने के सूत्र समझे। आज भी जब कोई व्यंग्य रचना का पाठ करता हूँ नरेंद्र पंडित जी की स्मृति हो आती है।

एक प्रोग्राम के डायरेक्टर श्री प्रभु जोशी जी (प्रभु दा) थे। वे न सिर्फ चित्रकार,कथाकार हैं बल्कि बहुत जीनियस व्यक्ति हैं। उनके निर्देशित कई कार्यक्रमों को आकाशवाणी के बड़े पुरस्कार मिलते रहे हैं। बाद में वे दूरदर्शन में भी गए। मुझे एक विनोद वार्ता 'मतदान कैसा दान' पत्रिका कार्यक्रम  में पढ़ना थी। प्रभु दा तो फिर प्रभु दा ही थे, वे वार्ता को सामान्य कैसे रहने देते। उन्होंने वार्ता को मुझ से भाषण शैली में पढ़वाया। दो चार लोगों को भी साथ में बैठा लिया ताकि किसी सभा की तरह वातावरण बन सके। एकत्र लोग हर बात और जुमले के बाद तालियां बजाते। 

ऐसा लगता जैसे किसी नेताजी की सभा चल रही हो। 

और जब वार्ता के अंत में भीड़ नारे लगाती है..'ब्रजेश भैया जिंदाबाद..!' धीरे धीरे प्रभु दा फेड आउट करते जाते हैं। मेरा मन खुशी से फूलता जाता है।


आकाशवाणी के इन प्रयोधर्मी और जीनियस लोगों के प्रति जितनी कृतज्ञता व्यक्त की जाए कम होगी...


नमन इनकी प्रतिभा और प्रेरक समर्पण और काम के प्रति निष्ठा को...!


ब्रजेश कानूनगो

स्वान्तः सुखाय 53 'मालवा हाउस' से आई गत्ते की वह अटैची

स्वान्तः सुखाय 53 

'मालवा हाउस' से आई गत्ते की वह अटैची 


गत्ते और रैग्जीन से बनी एक छोटी सी अटैची (ब्रीफकेस) माँ बहुत संभालकर रखा करती थी। अपने आखिरी समय तक वे उसमे अपने कुछ जरूरी सामान और पत्र पत्रिकाओं में छपी मेरी रचनाओं की कतरने बहुत जतन से सहेजा करती थीं। जब भी मैं उनसे मिलने जाता वे सभी कतरनें दिखातीं। मन करता तब लगभग उनका पारायण सा भी करती रहती थीं। वे नियमित अखबार पढ़ती थीं। जब मैं घर से बाहर नौकरी पर या स्थायी रूप से इंदौर रहने लगा तब अखबार में प्रकाशित रचना का सबसे पहला बधाई फोन देवास से उनका ही आता था।  9 नवंबर 2017 से माँ के वैसे ममतामयी बधाई फोन का अब सिर्फ इंतजार ही रह जाता है...!


बात माँ की उस खास 'अटैची' की ही करते हैं। दरअसल, वह माँ के लिए इसलिए खास थी कि वह मेरी किसी रचना के पहले मानदेय की राशि से खरीदी गई थी। अस्सी के दशक में युवावस्था के दौरान शुरुआती समय में अपने दोस्तों,आसपास के लोगों,स्वजनों,पड़ोसियों आदि के चरित्रों,घटनाओं से प्रेरित होकर कहानियां लिखने का प्रयास करता था। 

ऐसी ही एक कहानी 'आई' शीर्षक से लिखी थी जो बचपन मे मुझे माँ की तरह स्नेह देने वाली पिताजी के दफ्तर के सहायक की पत्नी के जीवन संघर्ष को लेकर लिखी थी। 


'आई' को रेडियो सुनने का बहुत शौक था। हर साल वे नया ट्रांजिस्टर खरीद लाया करती थीं। रविवार या छुट्टी के दिन मैं उनसे वह हथिया लेता और पूरे दिन सुना करता था। उनकी कोई संतान नहीं थी।

बहरहाल, उन्ही स्नेहमयी 'आई' पर लिखी वह कहानी आकाशवाणी के इंदौर केंद्र से 'युववाणी' कार्यक्रम मेरी ही आवाज में प्रसारित हुई। 


उस कार्यक्रम की उस वक्त की संयोजक और उद्घोषक की एक छवि मन में अभी तक बनी हुई है। वे बहुत मोहक थीं,सांवली थीं किन्तु उनकी आंखें और आवाज मन मोह लेती थीं। स्वर कोकिला की तरह मधुरता उनकी सहज उपस्थिति से बिखर जाया करती थी। लोकप्रिय गानों के लोकप्रिय 'मन भावन' कार्यक्रम सुनते हुए रेडियो पर उनकी आवाज के हम दीवाने थे लेकिन प्रत्यक्ष मिलना पहली बार उस पहले प्रसारण के दिन ही हुआ। 

आज दिमाग पर बहुत जोर डालकर उनका नाम याद करने की कोशिश की लगता है सम्भवतः वे 'इंदु आनन्द' ही रही होंगीं। 


'मालवा हाउस' स्थित आकाशवाणी के इंदौर केंद्र के देश के सबसे बड़े व शक्तिशाली ट्रांसमीटर से निकली तरंगे उन दिनों देश के कोने कोने तक आसानी से पहुंच जाया करती थी। राजस्थान,गुजरात,महाराष्ट्र में आकाशवाणी इंदौर के कार्यक्रम बहुत रुचि से सुने जाते थे।


इंदु आनन्द जैसी स्टार उद्घोषिका के संयोजन में हमारी कहानी 'आई' का पहली बार प्रसारण के बाद हमें कुछ मानदेय नकद प्राप्त हुआ।  देवास लौटते हुए इंदौर से गत्ते की वह अटैची हमने खरीद ली। बहुत दिनों उसमें हमारे प्रमाण पत्र, अंक सूचियां रखते  रहे। जब पुरानी होकर टूटने , फटने लगी तो खाली कर दी हमने।

यह माँ की ही समझ थी कि उन्होंने उस पर अपने हाथों से कपडे का कवर सिलकर उसकी उम्र बढ़ा दी। 

पुत्र की उपलब्धि को इसतरह कोई माँ ही धरोहर की तरह महत्वपूर्ण बना सकती है...


रेडियो से जुड़ी कुछ और बातें आगे....


ब्रजेश कानूनगो

Thursday, 8 October 2020

स्वान्तः सुखाय 52 : रेडियो का फिर लौटना और स्मृतियों का

स्वान्तः सुखाय 52

रेडियो का फिर लौटना और स्मृतियों का झरोखा

बचपन के दिनों में रेडियो सुनते हुए सोचा करते थे कि कितना अच्छा हो कि इस जादूई बक्से के भीतर के लोग स्पीकर लगे पर्दे पर साक्षात गाते,बजाते,नाचते,नाटक करते,समाचार सुनाते दिखाई भी देने लगे।


और जब हमारी यह ख्वाहिश विज्ञान और टेक्नोलोजी ने पूरी कर दी और भारत में भी दूरदर्शन का उदय हुआ किन्तु रेडियो के श्रोता धीरे धीरे टीवी के दर्शकों में बदलते गए।


घर घर में टीवी आ गया। पहले एक मात्र सरकारी चैनल और वह भी श्वेत श्याम जिसे चुने हुए केंद्रों पर बमुश्किल देखना सम्भव होता था। दूरदर्शन के विकास की सारी कहानी हमारी सबकी देखी समझी है। टीवी की चर्चा फिर कभी। आज यहां मैं रेडियो के उस स्वर्णिम काल के उतार और उसके पुनः लौटने के दौर की बात करना चाह रहा हूँ।


दूरदर्शन के आने के बाद जब टीवी पर अन्य मनोरंजक चैनलों को अनुमति मिल गई तो भारतीय परिवारों के बहुत बड़े हिस्से के घरों से बचे खुचे रेडियो सेट भी गायब हो गए या उनका स्थान घर के कबाड़खाने में ही रह गया। 

जब किसी से कहते भी कि भाई आज हमारी कहानी रेडियो पर आने वाली है तो अपने ही परिचितों के घर में वह सुनी नहीं जा सकती थी। ऐसे में रचनाकार अपनी रचना आकाशवाणी केंद्र के माइक्रोफोन को सुनाकर, चेक प्राप्त कर संतृष्ट हो लेता।


लेकिन यह सब रेडियो के स्वर्णिम दौर के बाद के उस वक्त की विडंबना है जब टीवी ने रेडियो माध्यम को प्रतिस्थापित करना प्रारंभ कर दिया था।


और अब जब टीवी से दुनियाभर में लोग ऊबने लगे हैं। निजी मनोरंजक व खबरिया चैनलों में प्रतिस्पर्धा की घटिया लड़ाइयां चलने लगी हैं। समाचार,विचार सब कुछ किन्ही दबावों और स्वार्थों से संचालित होने लगे हैं। ऐसे में यह दिलचस्प है कि लोग पुनः रेडियो का रुख करने को उद्यत हुए हैं।


एफएम प्रसारणों और मोबाइल एप्स के जरिये रेडियो सुनना अब बहुत आसान हुआ है। भारत के लोक प्रसारण चैनलों पर भी अधिकतर सुरुचि और स्वच्छता नजर आती है। 

यह अच्छा ही है कि रेडियो पर अभी 'टीआरपी' का  गणित खुल कर गंदगी पैदा नहीं कर पाया है। लोग टीवी चैनलों के आतंक ,सनसनी,उत्तेजना और विवेक को कुंठित करने वाली हरकतों से ऊबकर रेडियो के पुराने दौर में लौटने को उद्यत हुए हैं।

आइए एक कविता पढ़ते हैं आज...


कविता

रेडियो की स्मृति

ब्रजेश कानूनगो


गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों

बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह


कबाड मे पड़े रेडियो का इतिहास जानकर

फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें


न जाने क्या सुनते रहते हैं

छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका

जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश

आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही


स्मृति मे सुनाई पड़ता है

पायदानों पर चढता

अमीन सयानी का बिगुल


न जाने किस तिजोरी में कैद है

देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक

हॉकियों पर सवार होकर

मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह


स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं

फसलों के बचाव के तरीके

माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता

अपने समय का महत्वपूर्ण कवि


सारंगी रोती रहती है अकेली

कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू  


याद आता है रेडियो

सुनसान देवालय की तरह

मुख्य मन्दिर मे प्रवेश पाना

जब सम्भव नही होता आसानी से

और तब आता है याद

जब मारा गया हो बडा आदमी

वित्त मंत्री देश का भविष्य

निश्चित करने वाले हों संसद के सामनें

परिणाम निकलने वाला हो दान किए अधिकारों की संख्या का

धुएँ के बवंडर के बीच बिछ गईं हों लाशें

फैंकी जाने वाली हो क्रिकेट के घमासान में फैसलेवाली अंतिम गेन्द

और निकल जाए प्राण टेलीविजन के

सूख जाए तारों में दौडता हुआ रक्त

तब आता है याद

कबाड में पडा बैटरी से चलनेवाला

पुराना रेडियो


याद आती है जैसे वर्षों पुरानी स्मृति

जब युवा पिता

इमरती से भरा दौना लिए

दफ्तर से घर लौटते थे।


(रचनाकाल 1995)


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ब्रजेश कानूनगो

स्वान्तः सुखाय : 51 'विविध भारती' के संग इन दिनों

स्वान्तः सुखाय : 51

'विविध भारती' के संग इन दिनों 

इन दिनों दिनचर्या की पृष्ठभूमि में ज्यादातर रेडियो पर सुबह 7 बजे से रात 11 बजे तक 'विविध भारती' की स्वर लहरियां गूंजती रहती हैं। कभी मध्दिम तो कभी थोड़ी तेज आवाज में। मगर चलता रहता है पंचरंगी कार्यक्रम...


कोरोना काल में अब रेडियो की यह हमउम्र चैनल सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ और करीब से जुड़ गई है।

दरअसल दोपहर 1 बजे  'कुछ बातें कुछ गीत' कार्यक्रम से शुरू होने पर फेसबुक के माध्यम से श्रोता सीधे अपने मन की बात करके कार्यक्रम की थीम से जुड़ जाते हैं। कुछ सवाल भी होते हैं, कुछ रोचक किस्से, कुछ यादें...


कुछ अतीत जीवी वरिष्ठ नागरिक जो स्मृतियों से प्रेम करते हैं वे वर्ग पहेली हल करना या झपकी लेना भूलकर रेडियो से इन दिनों कुछ अधिक ही जुड़ गए हैं। कला,संगीत, साहित्य, कथा,पटकथा,स्क्रिप्ट, फ़िल्म जगत, अभिनय,फ़िल्म प्रोडक्शन आदि में जिन्हें थोड़ी बहुत भी रुचि है उनके लिए तो विविधभारती की दोपहर 'गोल्डन टाइम' सी हो जाती है।

सुमधुर सदाबहार गीतों के अलावा 'उजाले उनकी यादों के' ,'बॉम्बे टाकीज' आदि में आकाशवाणी की अनमोल धरोहरों के खजाने से जैसे ज्ञान,तकनीक और स्मृतियों की जलधाराएं सी मन के भीतर बहने लगती हैं।


अभी पिछले दिनों विविधभारती ने अपना 63 वां जन्म दिन मनाया तो फेसबुक पृष्ठ पर बहुत कुछ लाइव भी रहा। मुम्बई विविधभारती के उद्घोषकों से मिलना,उनको प्रस्तुति देते हुए देखना तो सुखद था ही लेकिन एक प्रयोग जो किया गया वह बहुत प्रभावित कर गया। इस अवसर पर एक रेडियो नाटक को लाइव प्रस्तुत किया गया।

जाने माने उद्घोषकों को भावप्रवण नाट्य वाचन करना देखकर उनकी प्रतिभा और उनके समर्पण व निपुणता ने अचंभित कर दिया।

हाँ, यह जरूर है कि इस तरह उनको सजीव देखकर उनके हुनर, श्रम व तकनीक का अवलोकन तो हुआ किन्तु जो आनन्द आंख बंद करके रेडियो नाटक सुनने का है वह जादू लाइव देखने में अवश्य हाथ से निकल गया।


मुझे लगता है रेडियो नाटक, प्रहसन का असली मजा शायद आंख बंद करके सुनने में ही है।

जुग जुग जियो 'विविध भारती'.....! हार्दिक शुभकामनाएं कि तुम्हे किसी की नजर न लगे...!


ब्रजेश कानूनगो

Monday, 5 October 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 50

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 

साहित्य परिवार के स्नेहिल मुखिया :श्री सूर्यकांत नागर

वर्षों दैनिक व्यंग्य कॉलमों में लिखते लिखते कुछ ऐसी आदत हो गई थी कि बहुत दूर तक रचना को खींच ले जाने का मन ही नहीं होता था। तुरन्त छप जाने और निरन्तरता के कारण मन भी नहीं हो पाता था कि कुछ बड़ी व्यंग्य रचना लिखी जाए।

ऐसे में जब नईदुनिया समाचार पत्र में 'खुला खाता' शीर्षक से व्यंग्य का साप्ताहिक कॉलम शुरू हुआ तो लम्बी रचनाएं लिखने, छपने और हाथ भाँजने के अवसर भी बढ़ गए।

इस बात का जिक्र महज इसलिए कि इस खास साप्ताहिक स्तंभ का सम्पादन श्री सूर्यकांत नागर जी किया करते थे।  कथात्मक और कुछ अधिक लम्बी रचनाओं की ओर रुचि पैदा होने में इस कॉलम की तथा आदरणीय श्री नागर साहब के प्रोत्साहन की भूमिका मेरे जीवन में महत्वपूर्ण रही है। हालांकि वे इतने सहज हैं कि वे कभी इस सच को स्वीकार करेंगे।

जितना भी मैंने श्री सूर्यकांत नागर जी को समझा है,महसूस किया है वे हमेशा परिवार के ही बड़े सदस्य की तरह लगे, जो परिवार के किसी छोटे सदस्य के भीतर थोड़ी भी साहित्यिक चमक देख उसकी प्रतिभा को सितारे की जगमगाहट में बदलने के प्रयास करने की कोशिश करते रहे हैं।

दरअसल, जिन वरिष्ठ रचनाकारों के कारण इंदौर को साहित्य जगत में जाना जाता है उनमें सूर्यकांत नागर जी की छवि और उनका सहज,आत्मीय और आडम्बर रहित व्यक्तित्व,आचरण उनके स्वीकार्य को बहुत बड़ा बना देता है।  मूलतः कथाकार,उपन्यासकार नागर साहब बहुत प्रभावी व्यंग्यकार, लघुकथाकार तो हैं ही कुछ खूबसूरत मार्मिक कविताएं भी उनकी कलम से निकली हैं। यही कारण है कि साहित्यिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक,आलोचनात्मक  लेख और व्याख्यानों को भी बहुत महत्व मिलता रहा है। कई रचना शिविरों और कार्यशालाओं में उनसे सीखने समझने के अवसर मिलते रहे हैं। श्री नागर जी का प्रोत्साहन ही था कि मेरी पहली किताब 'पुनः पधारें' (1995) में आ सकी।

साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका 'समावर्तन' में व्यंग्य केंद्रित 'वक्रोक्ति' खण्ड का वे त्रैमासिक सम्पादन करते हैं। इस खंड में मेरे व्यंग्य लेखन पर भी उन्होंने 8/10 पन्नों में सामग्री मंगवाकर प्रकाशित कर मुझे स्नेह दिया। उनकी विनम्रता देखिए कि आगे कहते हैं..'भाई! अन्यथा मत लेना आपको हम थोड़ा देरी से शामिल कर पाए।' 

यह बात उन जैसे मीठे फलों से लदे किसी पेड़ की विनम्र शाखा ही कह सकती है। उनके स्नेह की शाखा मेरे माथे पर किसी आशीर्वाद से कम नहीं।

आज भी जब किसी मेरी रचना या उपलब्धि का समाचार उन्हें मिलता है,वे मुझे  फोन करके मुझे नई जिम्मेदारी का अहसास करा देते हैं।


निसंदेह आदरणीय नागर साहब के प्रति गहरी आत्मीयता प्रकट करने के लिए शब्द तो कम पड़ ही जाते हैं। किन्तु उनकी तरह यदि हम साहित्य के प्रति, साहित्य की गतिविधियों के प्रति, साहित्यक रुचि वाले श्रोताओं के प्रति, बनते हुए लेखकों के प्रति,आयोजनों में सहजता से शामिल हो जाने वाले विनम्र व्यक्ति की तरह थोड़े भी हो सकें तो उनके प्रति हमारी सच्ची कृतज्ञता होगी।

ब्रजेश कानूनगो

Thursday, 20 August 2020

स्मृति के एकांत से.... स्वान्तः सुखाय 49


स्मृति के एकांत से.... स्वान्तः सुखाय 49

49

देवताले जी की याद में 


उस दिन एक फोन आया था। उधर से किसी ने कहा 'मैं एक शोधार्थी बोल रहा हूँ उज्जैन से। आज जनसत्ता में आपका पत्र पढ़ा। मैं आपका मुरीद हूँ,आपकी कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं। बड़ी मुश्किल से आपका फोन नंबर मिला।'


पहले तो मैं हतप्रभ रह गया लेकिन थोड़ी देर में ही अटकती आवाज के खास लहजे से पहचान गया। वे आदरणीय चंद्रकांत देवताले थे। 

मैंने कहा 'सर,ये उल्टी गंगा क्यों बहा रहे हैं।' तो जवाब में उनका जोरदार ठहाका सुनाई दिया।


एक मायने में देवताले सर कविता में हमारे प्रशिक्षक की तरह रहे। प्रलेस और प्राची के रचना शिविरों में आदरणीय भगवत रावत, कमलाप्रसाद जी और देवताले जी की सहज बातचीत नुमा व्याख्यानों से कविता को सीखने समझने में बड़ी मदद मिली। ये कहना गलत भी नही होगा कि ये रचनात्मक अवसर बैंक कर्मचारी नेता व सामाजिक कार्यकर्ता श्री आलोक खरे तथा मित्र और महत्वपूर्ण कवि कुमार अम्बुज की रचनात्मक सूझबूझ का परिणाम थे।


हास्य विनोद और चुहल,चुटकियों से भरे होने के साथ देवताले जी इतने भावुक और संवेदनशील थे कि बात करते हुए विह्वल से हो जाते थे। 

तंगबस्ती के बच्चों के शिविर में जब एक बार वे बच्चों से बातचीत कर रहे थे,उनका कंठ भर आया। कुछ कविताएँ भी उन्होंने सुनाई। उनके सत्र के बाद  हर बच्चा उनको छूने,उनसे हाथ मिलाने को लालायित हो गया। देवताले जी सबसे हाथ मिलाते रहे, उनकी आंखें डबडबाती रहीं।

इंदौर से उज्जैन चले जाने से बच्चों के शिविर में पुनः उनका आना हो नहीं पाया।

देवताले जी की वे स्मृतियां और कविताएं अब हमारी याद में हमेशा रहती हैं...


आइए आज यहां पढ़ते हैं देवताले जी की यह कविता...


अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही...

चंद्रकांत देवताले


अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही

तो मत करो कुछ ऐसा

कि जो किसी तरह सोए हैं उनकी नींद हराम हो जाए


हो सके तो बनो पहरुए

दुःस्वप्नों से बचाने के लिए उन्हें

गाओ कुछ शान्त मद्धिम

नींद और पके उनकी जिससे


सोए हुए बच्चे तो नन्हें फरिश्ते ही होते हैं

और सोई स्त्रियों के चेहरों पर

हम देख ही सकते हैं थके संगीत का विश्राम

और थोड़ा अधिक आदमी होकर देखेंगे तो

नहीं दिखेगा सोये दुश्मन के चेहरे पर भी

दुश्मनी का कोई निशान


अगर नींद नहीं आ रही हो तो

हँसो थोड़ा , झाँको शब्दों के भीतर

ख़ून की जाँच करो अपने

कहीं ठंडा तो नहीं हुआ।


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ब्रजेश कानूनगो

Monday, 27 July 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 48

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 48

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व्यंग्य के अक्ष पर चमकता 'जवाहर'

सन 1994 में इंदौर स्थान्तरित होकर आने तक मैं श्री जवाहर चौधरी जी से व्यक्तिगत रूप से कभी मिला नहीं था।

देवास, नीमच आदि में अपनी नौकरी करते हुए जब मेरी कोई व्यंग्य रचना नईदुनिया के 'अधबीच' स्तंभ में प्रकाशित होती तब उनका एक सुंदर अक्षरों में रचना की प्रशंसा में लिखा पोस्ट कार्ड अवश्य प्राप्त होता था। न सर्फ उनके खूबसूरत अक्षरों में लिखे शब्दों से मैं उत्साहित हो जाता था किन्तु उससे भी अधिक पत्र के नीचे उनके हस्ताक्षर बहुत मोहित करते थे। उनका हस्ताक्षर लगभग 'वन लाइनर' जैसा नजर आता है किंतु उसमें व्यंग्य की तरह वक्रता की बजाए  उनकी आत्मीयता और स्नेह की झलक प्रवाहित होती दिखती रही है।

बाद में इंदौर में होने वाले प्रत्येक साहित्यिक आयोजनों में उनसे भेंट होने लगी। प्रलेस की गोष्ठी में मुझे उनके महत्वपूर्ण व्यंग्य संग्रह 'प्रबुद्ध बकरियाँ' पर चर्चा करने का अवसर मिला था।उसके बाद तो हिंदी साहित्य समिति, केंद्रीय पुस्तकालय में होने वाली गोष्ठियों में नित्य प्रति मेल मुलाकात और साहित्यिक चर्चाएं होती रहीं। जो अभी तक कोरोना समय से पहले तक जारी रहीं हैं। हमारी बैंक में होने वाली रचनात्मक गतिविधियों और साहित्यिक संगठन 'प्राची' के कई कार्यक्रमों में उन्होंने मुख्य अतिथि का दायित्व स्वीकार करके हमें अनुग्रहित किया है।

हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा में इंदौर की पहचान बनाने में शरद जोशी के बाद जवाहर भाई का नाम सबसे पहले आना स्वाभाविक है। उनके रचनात्मक योगदान पर बातचीत तो हमेशा ही होती रही है लेकिन जवाहर भाई को मैं कुछ अलग कोणों से भी महसूस करता हूँ।

जवाहर चौधरी जी  के व्यंग्य लेखों का मैं प्रशंसक रहा हूँ। बल्कि एक तरह से व्यंग्य लेखन के प्रति उनकी एकाग्रता और समझ मेरे लिए प्रेरणा बनती रही है। वे पूर्ण रूप से व्यंग्य लेखन के प्रति समर्पित रहे हैं इसलिए व्यंग्य के उनके कीर्तिमान और प्रतिमान उनकी निष्ठा और मेहनत के परिणाम हैं। नाटक हो या कहानी या लघुकथा उनकी व्यंग्य दृष्टि हर विधा में मौजूद रही है। व्यंग्य के अक्ष के आसपास उनका समग्र सृजन गतिमान रहता रहा है।

मंच पर व्यंग्य पढ़ते हुए कई बार सुना है। व्यंग्य के संवादों को वे बहुत मिमिक्री और पात्र के अपने स्वभाव की तरह बहुत रोचकता से सुनाते हैं। रचना का वह चरित्र हमें उनके मुंह से बोलते दिखाई देने लगता है। मुझे उनके भीतर का कुशल नाट्य वार्ताकार संवाद करते नजर आता रहा है। संवाद लिखते समय जवाहर चौधरी उसकी नाट्य प्रस्तुति और समग्र प्रभाव का पूरा ध्यान रखते हैं। उनकी रचनाओं में दिलचस्पी का एक यह भी बड़ा कारण होता है। यही वजह है कि उनकी अनेक रचनाओं के नाट्य रूपांतरण हुए हैं। प्रहसन और नाटक रचने की उनकी यह प्रतिभा अन्य व्यंग्यकारों में उन्हें विशिष्ट स्थान दिलाती है। यह तो मुझे बहुत बाद में पता चला था कि वे बहुत अच्छे कार्टूनिस्ट भी हैं और  एक सांध्यकालीन में नियमित व्यंग्य चित्र बनाते रहे हैं।

साफगोई और धैर्य जैसे गुण मैंने उनके व्यवहार और लेखन में हमेशा महसूस किए हैं। मित्र की खुशी का उन्हें हमेशा खयाल रहता है। वे कभी नहीं चाहते कि उनके किसी कृत्य से रिश्तों की डोर में कोई गांठ पड़ जाए। लेकिन बेहतरी के लिए उनका सहयोग हमेशा मित्रों को मिलना बहुत सहज होता है।

दूसरों के मन की बात को समझ कर गलती को स्वीकार कर लेना बहुत कम लोगों में पाया जाता है। मैंने महसूस किया कि वे इस मामले में बहुत बड़ा हृदय रखते हैं।

बहुत संभव है कुछ मित्रों को शायद जवाहर चौधरी जी के लिए मेरे ये कथन अजीब लगे किन्तु यह बिल्कुल सही है कि व्यंग्य लेखन के प्रति उनका समर्पण और रचना की पूर्णता और प्रकाशन में धैर्य मेरे मन में उनके प्रति सम्मान में वृद्धि करता है।

व्यंग्य लेखन में उन्होंने जो अर्जित किया वह किसी भी व्यंग्यकार की आकांक्षा हो सकती है....मेरी भी है....किन्तु  वैसा जवाहर बनना इतना आसान भी नहीं....

ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, 22 July 2020

स्मृति के एकांत से... स्वान्तः सुखाय 47

स्मृति के एकांत से... स्वान्तः सुखाय 47

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सुर में होते थे नाम और संबंध

राजेश,नरेश,मुकेश, ब्रजेश,महेश,शैलेश,गिरीश, योगेश,दिनेश,रमेश,यतीश,सुरेश,सुभाष, सतीश।

ये 'नामकरण  शब्दकोश' के किसी अध्याय का अंश नहीं है।  हमारे कुटुंब की दो पीढ़ियों के बालकों के नाम रहे हैं। बहुत सुर में थे ये नाम और सम्बन्ध भी। अब ये सब लोग उम्र में 55/60 से ऊपर हैं।

ये तो फिर वे नाम हैं जो स्कूल में प्रवेश के समय दर्ज कराए गए थे। कुछ की पहचान तो बोलते नाम से ही अब तक कायम है। एक विवाह समारोह में एक युवक ने मेरे पांव छुए और बताया कि अंकल मैं प्रतीक हूँ। मैंने पहचानने में थोड़ा समय लगाया तो उसने तुरंत मेरी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा-अरे अंकल मैं 'भय्यू जी' का बेटा हूँ। मैंने स्नेह से गले लगा लिया। 

मेरे बचपन के मित्र और हमउम्र रिश्ते में काका को 'भय्यू' के अलावा और कैसे जान सकता था। 'टुन्ना' जी टुन्ना साहब कहलाने लगे। 'मुन्ना' जी बड़े होने से मुन्ना साहब हो गये किन्तु बहुत कम लोग जान पाए कि उनके असली नाम क्या थे? इसी रिदम में मुन्ना के साथ बहन मुन्नी भी रहेंगीं। 'टुन्ना' हैं तो उनकी बहन निश्चित ही 'टुन्नी' कहलाएंगीं।

अब 'बुग्गा' को ही लीजिए। वे अब भी 'बुग्गा जी' ही हैं। हमारे बच्चों के वे बुग्गा अंकल हो गए हैं किंतु उन्हें उनका असली नाम पता ही नहीं होगा।
ऐसा भी नहीं है कि इन सबके स्कूली नाम अच्छे नहीं थे। वे बहुत सोच समझकर रखे गए  अभिजात्य नाम थे परन्तु बुग्गा जी को कोई राहुल से, भय्यू जी को शरद से टुन्नाजी को इंद्रजीत के नाम से या मुन्ना साहब को प्रदीपकुमार नाम से आज भी कोई संबोधित नहीं कर पाता।

कुटुंब इतना विशाल होता था कि बाहर से आने वाला अनजान व्यक्ति जान ही नहीं पाता था कि किस बच्चे के माता पिता कौन हैं। महेश जी के पिताजी किताब की दुकान पर साथ आये ब्रजेश को भी अगली कक्षा की किताबें खरीदकर दे देते थे। शैलेश को दोपहर का नाश्ता गिरीश की चाची करवा देती थीं।

फोटोग्राफर आता था तो आधा घंटा ग्रुप फोटोग्राफ की तैयारी में लगता था। अब अपने-अपने सेल्फी हैं।
लोगों के समूह में भी बच्चों के प्रति अधिकारपूर्ण व्यवहार से ही अनुमान हो जाता है कि फलां बच्चे के माँ बाप कौन से हैं।

एक किस्सा याद आ रहा। गर्मी की एक दोपहर को कुटुंब के कोई सात आठ बच्चे घर के पिछवाड़े बाड़े में खेल रहे थे। पास के गांव से ग्रामीण दंपत्ति शुद्ध घी बेचने आया करते थे। उस दिन भी आगे मुख्य द्वार की चौखट पर बैठकर दादी और माँ उनसे मोल भाव कर रहे थे। धूप में आये थे तो माँ ने उन्हें ठंडा पानी लाकर दिया। थोड़ी देर सुस्ताने लगे तभी हम बच्चों का खेल खत्म हो गया और बाड़े से निकलकर एक एक बच्चा चौखट पार कर बाहर निकलने लगा। अब मैदान में जाकर खेलना था।
वे घी बेचने आये ग्रामीण दंपत्ति हम सबको देखते रहे। मैं और मेरा भाई सबसे पीछे थे।
तभी मैंने पीछे से सुना कि घी वाली औरत दादी से पूछ रही थी - 'काय हो मासाब , ई सारा नाना नानी अन्ही लाड़ी काज है?!!'
(क्या ये सारे सात आठ बच्चे तुम्हारी इस बहू के ही हैं?')

मेरी माँ की उस वक्त क्या हालत हुई होगी आप सहज कल्पना कर सकते हैं। दरअसल उस औरत का प्रश्न भी गलत नहीं था। उस जमाने में सात,आठ बच्चों के माता पिता हो जाना अधिक आश्चर्य की बात नहीं हुआ करती थी।

अब जो माइक्रो फेमिली का समय आया है उसमें ये बातें शायद अविश्वसनीय किस्से कहानियों की तरह ही लगें। बच्चों के जो नाम अब आ रहे हैं, उनमे ऐसी लय नहीं देखने को मिलती। बीट्स की तरह खण्ड-खण्ड बजते हैं नाम और सम्बन्ध।

आइये आज बचपन के उन मस्ती भरे दिनों और दोस्तों को याद करते हुए थोड़ा सा बड़ा बन जाते हैं इस कविता के साथ...

कविता
स्वाद
ब्रजेश कानूनगो 

खट्टे-कसैले की मौजूदगी के बावजूद
बहुत बड़ा हिस्सा मीठा ही था उन दिनों 
सलीम और मैं दौड़ते चले जाते थे
घंटी बजते ही दत्त मंदिर की ओर
प्रवचन के बाद बंटने वाला
‘गोपाल काला’ दही से बनता था
दोस्ती का वह स्वाद बना हुआ है अब तक 

कैसे भुलाया जा सकता है
खालिस दूध से बना शरबत
कमरू आपा के प्यार जैसा मधुर
इस्माइल चाचा की रेवड़ियाँ और रोट
माँ के बनाए लड्डुओं की तरह
घुलते जाते थे मुंह में

नहर बन गई गली में
मछलियों की तरह बहकर आते थे भुट्टे और ककड़ियाँ
किशोर, बुग्गा, भय्यू और सलीम सब मिल करते थे शिकार
गर्म पकौड़ों की तरह लगता था उनका स्वाद
बरसात में भीगते हुए

स्वाद तो सेव-परमल का भी कुछ कम नहीं होता था
जो होली की रात चंदे की रकम से खाते थे हम बच्चे 
पिता की दूकान से चुराकर लाता था अब्दुल
प्याज और हरी मिर्च 

चखा तो नहीं पर देखा जरूर है विष का असर
खँडहर की खुदाई करते हुए मंगल का अमंगल देखा है

कॉलेज के दिनों में साइनाइड चख लेने का
दावा किया था एक प्रोफ़ेसर ने तो हँसे थे सब लोग
जीवित बचे तो पागल कहा जाने लगा उन्हें   
झूठा नहीं था रसायन विज्ञानी
हो सकता है अधिक विषैले की उपस्थिति ने
बेअसर कर दिया हो जहर का असर
या भीतर के किसी विष निरोधक तत्व ने
किया हो जमकर मुकाबला   

विष का असर देखा जा सकता है अब भी आसानी से
रंग नहीं अब स्वाद से एकाकार होता है गिरगिट 
फलों, सब्जियों और अनाज के स्वाद में ऐसे घुलता है
कि पहचानना मुश्किल है विष का स्वाद

मनुष्यता के आँगन में घुसे आ रहे हैं विषैले जंतु
घुल रहा है साइनाइड आबोहवा में धीरे-धीरे
नदियाँ, भाषाएँ दूषित होने लगी हैं

पागल प्रोफ़ेसर कहाँ हो तुम
बताओ यह किस खतरनाक रसायन का विस्तार है 
चखो इसे ठीक से
घोषित करो इसका सही-सही स्वाद

विष के खिलाफ रणनीति बनाने में 
स्वाद का विश्लेषण बहुत जरूरी हो गया है अब.

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ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, 15 July 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 46

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 46

46
'एकता और अनुशासन' का पाठ पढ़ाती एनसीसी  

स्कूल कॉलेज के दिनों में लिखने पढ़ने में रुचि के अलावा जिन अन्य गतिविधियों में बहुत मजा आता था उनमें से एनसीसी की  परेड, प्रशिक्षण और साल में एक बार लगने वाले आउटडोर कैम्प सबसे अधिक आकर्षित करते थे।

नवीं, दसवीं,ग्यारहवीं कक्षाओं तथा ग्रेजुएशन के तीन वर्षों तक लगातार नेशनल केडेड कोर( राष्ट्रीय छात्र सेना) का सदस्य होने का सौभाग्य मुझे मिला। इस प्रशिक्षण के जूनियर विंग के 'ए' प्रमाण पत्र तथा सीनियर विंग के 'बी' व 'सी' प्रमाणपत्रों की योग्यता अर्जित करने का गौरव भाव तो हमेशा रहा ही किन्तु इससे बढ़कर जीवन में हर काम को व्यवस्थित व अनुशासित रूप से करने की प्रवत्ति जो भी थोड़ी बहुत आई उसका अधिकांश श्रेय एनसीसी के प्रशिक्षण को ही दे सकता हूँ।

सन 1968 में आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद देवास के नारायण विद्या मंदिर (एनवीएम) में दाखिला लिया तो उसी वक्त एनसीसी में प्रशिक्षण का फॉर्म भी भर दिया। स्काउट गाइड या एनसीसी में से कोई एक प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होता था उन दिनों।

पंडित जवाहर लाल नेहरू के कहने पर एनसीसी प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम के एक भाग के रूप में सामुदायिक विकास, सामाजिक सेवा गतिविधियों में शामिल करने के लिए बढ़ाया गया था। राष्ट्र की आवश्यकता को पूरा करने के लिए। भारत चीन युद्ध के बाद एनसीसी प्रशिक्षण 1963 में अनिवार्य किया गया था। बाद में 1968 में इस कोर को फिर स्वैच्छिक कर दिया गया था। हमारे समय में स्काउट गाइड या एनसीसी में से कोई एक प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होता था उन दिनों। मैंने एनसीसी को प्राथमिकता दे दी।

प्रसंगवश यहां यह जानकारी देना उचित होगा कि एनसीसी 15 जुलाई 1948 को राष्ट्रीय कैडेट कोर अधिनियम के अंतर्गत स्थापित की गई थी। जो भारतीय रक्षा अधिनियम 1917 के अधीन  था। अब यह स्वैच्छिक आधार पर स्कूल और कॉलेज के छात्रों के लिए उपलब्ध है। राष्ट्रीय कैडेट कोर अनुशासित और देशभक्त नागरिकों में देश के युवाओं को संवारने में लगे हुए सेना, नौसेना और वायु सेना के घटकों का एक त्रिकोणीय सेवा संगठन है। कैडेटों को छोटे हथियारों और परेड में बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है। अधिकारियों और कैडेटों को सैन्य सेवा के लिए कोई दायित्व नहीं होता लेकिन कोर में उपलब्धियों के आधार पर चयन के दौरान सामान्य उम्मीदवारों पर वरीयता दी जा सकती है।

कैरियर में एनसीसी प्रमाणपत्रों के कारण मिलने वाले अतिरिक्त लाभ को देखते हुए ही मैं भी 'एकता और अनुशासन' जैसे आदर्श वाक्य वाले इस महत्वपूर्ण संगठन  का सदस्य बना था।

स्कूल के ही एक व्याख्याता को उचित प्रशिक्षण के बाद कैप्टन की रेंक देकर स्कूल इकाई का प्रमुख बनाया जाता था। उन्हें बाकयदा खाकी रंग का निर्धारित गणवेश भी पहनना होता था। गणित और भौतिकशास्त्र के हमारे व्याख्याता कैप्टन सहस्रबुद्धे सर हमारे प्रमुख अधिकारी थे। 

स्कूल के खेल मैदान पर प्रत्येक रविवार को प्रशिक्षण की खुली कक्षाएं लगती थीं। व्यावहारिक और सैद्धांतिक जानकारियां दी जातीं। एनसीसी दफ्तर में नियुक्त सेना के सेवानिवृत्त लेकिन यहां प्रतिनियुक्त अधिकारी ट्रेनिंग देते। परेड करवाते। उनके सैनिक गणवेश बहुत आकर्षित करते थे। हमें भी इसी तरह अपने यूनिफॉर्म के साथ पूरी चमक और धमक के साथ परेड में शामिल होना होता था।

स्कूल में एक कक्ष एनसीसी के लिए ही आबंटित होता था,जिसमें गणवेश, जूते,सॉक्स, बेल्ट,कैप व अन्य बेजेस आदि रखे होते थे। प्रत्येक केडेड को यह सामग्री दी जाती थी।
मैं स्वयं बड़े उत्साह से घर पर प्रति सप्ताह गणवेश को धोकर, अरारोट का कलफ लगाकर प्रेस करता था। पीतल के बक्कलों को पीतल पोलिश (ब्रासो) लगाकर और जूतों को जूता पॉलिश लगाकर कपड़ा रगड़कर खूब चमका देता। हमारे ट्रेनर (उस्तादजी) के कहे अनुसार जूतों में अपने चेहरे की झलक नजर आने तक चमकाने की कोशिश होती थी। 

साप्ताहिक प्रशिक्षण के बाद परेड ग्राउंड पर ही हम लोगों को पर्याप्त नाश्ता दिया जाता था।

जब 303 राइफल चलाना सैद्धांतिक रूप से सिखा दिया जाता तो देवास की टेकडी के पीछे बनी फायरिंग रेंज पर हमें ले जाया जाता। असली बन्दूकों से व्यावहारिक व वास्तविक रूप से एक आंख बंद कर बंदूक की 'फ़ॉर साइट की नोक को बेक साइट की यू से देखते हुए' निशाना साधने और टारगेट  'बुल' याने सेंटर (केंद्र) में गोली दागने का बारी बारी से अभ्यास कराया जाता। दस गोलियों में से जिसकी जितनी अधिक सेंटर सर्किल में लगती वह निशानेबाजी में उतना ही प्रवीण माना जाता।

मुझे खुशी है कि निशाना लगाने की कला में मैं आज 'व्यंग्य विधा' से ज्यादा कुशल था। अधिकांश निशाने सही लगाया करता था। एक बार तो दस में से दस निशाने 'बुल' में लगाकर न सिर्फ उस्ताद जी से पीठ ठुकवाई बल्कि नीमच में आयोजित शूटिंग कॉम्पिटिशन के लिए मेरा चयन भी हुआ।
देवास टेकडी की उस फायरिंग रेंज पर तो शायद अब पिकनिक स्पॉट विकसित हो गया है। बाद में 'जामगोद' रेंज पर ले जाया जाने लगा।

कॉलेज के दौरान प्राणिकी के हमारे  प्रोफेसर मेजर डॉ खोचे साहब प्रमुख थे। उनका वैसे ही जीवन बहुत अनुशासित और प्रभावशाली था। बाद में वे महाविद्यालय के सफल प्राचार्य भी रहे।

कॉलेज ग्राउंड की बजाए कभी कभी पुलिस परेड ग्राउंड पर भी प्रशिक्षण होता था। मुझे यहां बी और सी प्रमाणपत्र के समय 'अंडर ऑफिसर' जैसे उच्च छात्र कैडेट पद का सौभाग्य मिला था। छब्बीस जनवरी की गणतंत्र दिवस की जिला स्तरीय सामूहिक परेड में छात्र कैडेट समूह का नेतृत्व करने का गौरव मिला।

दशहरा दीपावली अवकाश में जो आउटडोर कैम्प होते थे उनमे पूरी बटालियन से सम्बद्ध स्कूलों कॉलेजों के छात्र कैडेट हिस्सा लेते थे। ऐसे कुछ कैम्प इंदौर के देवधर्म टेकरी, महू के पशुचिकित्सा महाविद्यालय,नीमच के महाविद्यालय के निर्जन इलाकों में भी लगे थे। उस वक्त के सुनसान इलाके अब शहरों की सीमा में आकर आबाद हो गए हैं।

कैम्पों में हमें टेंटों को बांधने से लेकर शिविर स्थल को सजाने, टेंट में अपनी दरी,कम्बल की व्यवस्थित घड़ी करना तक सिखाया गया था। एक प्लेट और एक मग की नाम मात्र सामग्री से दैनिक कामकाज और भोजन आदि करना भी बहुत सहज हो जाता था।
दिन भर मैदान और किसी वृक्ष की छांव में कक्षाएं चलतीं। परेड होती।

यहां कृत्रिम युद्धाभ्यास भी कराया जाता था। छात्रों की दो टुकड़ियां बना दी जातीं और दूर छोड़ दी जातीं। उस्तादजी भी साथ होते। महू कैम्प के दौरान एक टुकड़ी जानापाव पहाड़ी के आसपास से रवाना हुई। दूसरी ओर से दूसरी टुकड़ी छोड़ी गई। रात को चंद्रमा के प्रकाश में घमासान हुआ। उस्तादजी सब कुछ समझाते सिखाते जाते थे। बाद में सबको लेकर पहाड़ी पर ले जाया गया। उस रोमांच की वह अनुभूति अब भी महसूस होती  रहती है।

पाठकों को सम्भवतः यह सब आत्म प्रवंचना सी लगे किन्तु  यही सब स्मृतियाँ अब भी जीवन में उत्साह भरती रहती हैं।

ब्रजेश कानूनगो

Saturday, 11 July 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 45

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 45

45
महफ़िल में लूट ! 

कोरोना काल में पहले लॉक डाउन और फिर अनलॉक के नए नए अनुभव हो रहे हैं। अनलॉक होते ही बदमाशों ने दिन दहाड़े घरों में घुसकर चाकू की नोक पर लोगों की संपत्ति और धन लूटने की घटनाओं को अंजाम दिया। अभी कुछ युवकों ने इंदौर की एक बैंक में 'डकैती' करके  भारी रकम की 'लूट' की।
इन घटनाओं पर बहुत लोग लिखेंगे। शासन और व्यवस्थाओं के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करेंगे। जो जरूरी भी है किंतु मुझे इस 'लूट' ने किसी और सकारात्मक संदर्भों की ओर विचार करने को मोड़ दिया है।

मैं आज उन 'दिल लूटने वाले जादूगरों' को याद करना चाहता हूँ जो अपने हुनर या प्रतिभा से महफिलें लूट लिया करते थे। कई बार अखबारों में सुर्खियां होती थी कि फलां शायर ने तो आज मुशायरा ही लूट लिया। ये ऐसी लूट हुआ करती थी जिसकी रपट किसी थाने में नहीं लिखवानी पड़ती थी। लुटरे को कभी हथकड़ी नहीं पड़ती थी बल्कि गले में फूलों की मालाएं पहना दी जाती थीं।

इन महफिलों में शामिल होने और उन्हें सुनने के पर्याप्त अवसर मिलते रहे। कवि सम्मेलन, मुशायरों के अलावा सुगम और शास्त्रीय संगीत की सभाओं या महफिलों का बड़ा मजा हुआ करता था। खासकर युवावस्था के दौरान जब देवास के मल्हार स्मृति मंदिर सभागृह में जब कोई महफ़िल सजती तो शहर भर के कला संस्कृति प्रेमी लोगों की भीड़ ही उमड़ पड़ती थी।
यहाँ आयोजित किसी भी कार्यक्रम का स्तर और महत्व केवल इसी बात से बढ़ जाता था कि वह इस सभागार में सम्पन्न हो रहा है।

पंडित कुमार गंधर्व जी के प्रयासों से देश के ख्याति प्राप्त कलाकारों, गायकों, संगीतकारों की गौरवशाली महफिलें यहां सजतीं तो जैसे पूरा नगर ही कला मर्मज्ञों की आबादी में तब्दील हो जाया करता था। कुछ बड़े कलाविन्द तो देशभर से मात्र श्रोता की हैसियत से ही इन महफिलों में शामिल हुआ करते थे।खासतौर से जब कुमार साहब के गायन की महफ़िल सजती नीचे जमीन पर बिछी चादर पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल बारपुते, चित्रकार विष्णु चिंचालकर, नवगीतकार प्रो नईम जी सहित पुणे,भोपाल,मुम्बई आदि से आए गुणीजन सबसे आगे की पंक्ति में बैठकर 'दाद' दिया करते थे।
ये वे लोग थे जिनकी 'वाह' बिल्कुल ठीक समय पर निकलकर गायक की हौसला हफजाई करती थी। उनकी गर्दनों का हिलना और तालियों के स्वर मंच के स्वरों की संगीत की समझ के साथ संगत किया करते थे।
मुशायरों, कवि सम्मेलनों में तो इन दिनों 'दाद', 'प्रशंसा' और 'तालियां' मांगकर पाने की प्रथा चल पड़ी है किंतु उस दौर में कवि, शायर की पंक्तियों पर तथा संगीत महफिलों में  केवल स्वर लहरियों की प्रस्तुति पर बिन मांगे ही देर तक सभागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहता था।

ऐसा नहीं है कि अब महफिलें बेजान हो गईं हैं, आज भी खूब  लूटी जाती हैं महफिलें किन्तु अब पहली पंक्ति में बैठने वाले वैसे पारखी श्रोता व दिलों की संख्या में बहुत कमी आ गई है। दिल से मिली वास्तविक दाद दुर्लभ सी लगती है...

सोशल मीडिया के 'लाइक्स' और 'वेलडन' जैसी आभासी प्रशंसाओं के इस जमाने में महफिलें लूट लेने और दिल लुटाने वाले लोगों की बातें थोड़ी अविश्वसनीय लगें पर यह होता रहा है हमारे यहां...

आइये इसी 'दाद', 'प्रशंसा' और 'तालियों' की अनुभूतियों पर लिखी कविता पढ़ लेते हैं....

कविता
वाह ! क्या बात है ! 

अद्भुत नजारा है सभागार में
सुरों का साम्राज्य पसरा हुआ है चारों तरफ
गायक की भंगिमाओं के साथ
एक आलाप चल रहा है श्रोताओं के भीतर
तानपुरे की मद्दिम लहरों पर सवार
तबले और आवाज की नाँवें दौड़ने लगती है
तो निहाल हो जाते हैं संगीत यात्री

लम्बी दौड़ के बाद जब सफ़र थमता है तो
अचंभित सैंकड़ों स्वर फूट पड़ते हैं-
वाह-वाह ! क्या बात है !

वाह-वाह के दो शब्द
नई ऊर्जा से भर देते हैं कलाकारों को

और वह एक बैठा है
सभागार में बिलकुल चुपचाप
उठती उतराती तरंगों का
हो नहीं रहा कोई असर
किसी कंपनी के ट्रेड मार्क की तरह
जड़ हो गया है उसका चेहरा

इतना तो वह जानता ही होगा
आया है जब महफ़िल में 
कि मित्र ही नहीं
शत्रु भी होते हैं तारीफ़ के हकदार
कलाएँ तो फिर दुश्मन भी नहीं रहीं कभी किसी की 

संवेदनाओं के पौधों में प्रशंसा की कलियाँ
खिली नहीं अब तक उसके भीतर 
क्या शिकार हो गया है वह
प्रशंसा नहीं करने की किसी कूटनीति का

लगता है उसका कोई दोष नहीं इसमें
कि वह बजा नहीं पा रहा तालियाँ
हो सकता है पहले बहुत की हो उसने मेहनत
खूब लिखी हों जीवन की ख़ूबसूरत कविताएं
और किसी ने बजाई नहीं हों ताली 

सुन ही नहीं पाया हो कभी
कि- वाह! क्या बात है !

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ब्रजेश कानूनगो

स्मृति के एकांत से ...स्वान्तः सुखाय 44

स्मृति के एकांत से ...स्वान्तः सुखाय 44

44
बचपन में साइकिल

अब तो बच्चों को दो,ढाई साल का होते ही छोटी सी खिलौना साइकिल की सवारी करने का मौका मिल जाता है किंतु हमारे बचपन मे हमें साइकिल चलाने का मौका पहली कक्षा में भर्ती होने के बाद ही मिल पाया। वह भी बहुत मिन्नतों और जिद के बाद बाजार की दुकान से 15 पैसे प्रति घण्टा पर किराए पर मिलने वाली 'अद्धा' साइकिल हाथ से धकाते हुए घर तक लाए।

उन दिनों किराए पर मिलने वाली साइकिलों का बहुत चलन था। बस स्टैंड पर से  मेहमान भी किराए की साइकिल दिनभर के लिए किराए पर उठाकर मिलने आ सकते थे। आज भी कुछ जगह ऐसा चलन है भी। बाहर से सामान आदि बेचने आए फेरी वाले इसी तरह दिनभर के लिए साइकिल किराए पर लेकर माल बेचकर शाम को वापिस अपने गांव लौट जाते हैं।

इन्ही साइकिल दुकानों पर बच्चों के लिए छोटी छोटी साइकिलें भी मिलती थीं। उनकी अलग अलग ऊंचाई होती थीं।अपनी ऊंचाई के हिसाब से बच्चे साइकिल  किराए पर ले लेते। हमारे लिए साइकिल किराए पर लाना भी थोड़ा मुश्किल ही रहा। एक तो हम खुद 'राजा बाबू' टाइप थोड़े नरम नाजुक किस्म के प्राणी थे। मजाक में हमें कुछ लोग 'हाथ पैर अगरबत्ती और मुंह मोमबत्ती' कहकर सम्मानित किया करते थे। सो हाथ पैर तुड़वाने से खुद भी डरते थे और घरवाले भी। एक दिन दोस्त की अद्धा साइकिल पर कुछ देर साइकिल सीखने की कोशिश की तो थोड़ा मजा आने लगा। फिर माँ के सामने जिद और मगरमच्छी टेसुए बहाने के बाद पन्द्रह पैसे मिल गए।

दुकान से सवारी करते हुए साइकिल घर तक लाने की हिम्मत नहीं हुई तो हैंडल थामकर धकाते हुए ही ले आए। मुहल्ले में घुसते ही बहुत से दोस्त इकट्ठा हो गए। जो दोस्त साइकिल पर बैठाकर पीछे से सीट पकड़कर बैलेंस बनाकर धकाता था उसे भी साइकिल चलाने का मौका मिलता था। इसलिए फिर ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। दोस्तों ने मिलकर सिखा भी दी। फिर शुरू हुआ बिना किसी सहारे के स्वतंत्र रूप से साइकिल चलाना। तब आज की तरह छोटी साइकिलों में पीछे अतिरिक्त छोटे पहियों के सहारे तो लगे होते नहीं थे। स्वतंत्र चालन में घुटने और कोहनी कलाइयां घायल होना अवश्यम्भावी होती थीं। एक तरह से ये घाव ड्राइविंग लाइसेंस की तरह होता था। जो बच्चा घायल हो जाता समझो उसे साइकिल चलाना आ गया। हमारे घुटने भी चार पांच बार छिले किन्तु हम अद्धा साइकिल कुशलता से चलाने लग गए।
कुछ बड़ा हुए तो पिताजी की 24 इंची साइकिल को बिना सीट पर बैठे फ्रेम के बीच से पैरों को कैंची की शक्ल में पैडलों पर टिकाकर एक हाथ से  हैंडल का एक सिरा और दूसरे से सीट को पकड़कर साइकिल चलाने का अद्भुत कौशल हांसिल कर लिया। हमारे पूर्ववर्ती खिलाड़ी इस कला में निपुण थे तो आसानी रही। शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक कि दूरी इसी तरह के साइकिल चालन से हम सब दोस्त कर लिया करते थे। ब्रेक तो लगा नहीं सकते थे। पैरों से ही रोकना पड़ती थी साइकिल। फिर जब दोनों हाथों से हैंडल पकड़कर चलाने में कुशलता हासिल की तो एक दिन  पिताजी की 24 इंची साइकिल पर सीट पर ओटले के किनारे की सहायता से चढ़ बैठे। लगा जैसे चांद पर बैठकर धरती को निहार रहे हों। धक्के से साइकिल आगे बढ़ाई तो पैर पैडलों  तक पहुंच ही नहीं पाए। एक पैडल ऊपर आता, हम पैर से उसे नीचे ढकेल देते तो दूसरा पैडल ऊपर आ जाता। दूसरे पैर से उसे नीचे ढकेल देते। साइकिल आगे बढ़ती जाती।
इस करिश्मे को करते हुए भी कई बार हाथ पैरों में चोट आई। किन्तु  साइकिल चलाने के आनन्द में जख्मों का दर्द कम हो जाता था। हालांकि रात को माँ हल्दी और तेल का लेप लगा देती थी किन्तु रात भर घावों में जो टीस उठती रहती थी, दर्द की वह 'झपक' अब भी याद आ जाती है।

आइये बचपन के उस साइकिल समय के बहाने स्मृतियों से थोड़ी धूल हटाते हैं।

आजादी के बाद से ही न सिर्फ देश की यातायात व्यवस्था में बल्कि सामान्य जनजीवन और समाजार्थिक व्यवस्था के संचालन में भी साइकिलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। खासतौर पर साठ से लेकर अस्सी के दशक तक ज्यादातर परिवारों के पास साइकिल अवश्य होती थी।

गांवों में किसान साप्ताहिक मंडियों तक सब्जी और दूसरी फसलों को साइकिल से ही लाते ले जाते थे। दूध की सप्लाई गांवों से पास से कस्बाई बाजारों तक साइकिल के जरिये ही होती थी। डाक विभाग का तो पूरा तंत्र ही साइकिल के माध्यम से चलता था।
हालांकिआज भी कई पोस्टमैन साइकिल से चिट्ठियां बांटते हैं।बड़ी संख्या में कूरियर बाँटने वाले भी साइकिल का इस्तेमाल अब भी करते हैं किन्तु उदारीकरण और आर्थिक बदलाव के बाद से ही देश की युवा पीढ़ी ने मोटरसाइकिल को अपना लिया।
यह संतोषजनक है कि भारत में साइकिल की अहमियत खत्म नहीं हुई है। शायद यही वजह है कि चीन के बाद दुनिया में आज भी सबसे ज्यादा साइकिलें भारत में बनती हैं।

एक तरह से बचपन का वह समय साइकिलों का स्वर्णकाल ही था। स्कूल,कॉलेजों के शिक्षक प्रोफेसर, सरकारी दफ्तरों के कर्मचारी आदि सभी साइकिलों पर सवार होकर ही अपने कामकाज के लिए दफ्तरों तक आते थे।  पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों के आने के बाद आधुनिकीकरण के साथ धीरे धीरे साइकिलों का चलन कम होता गया। किराए पर मिलने वाली साइकिलों का स्थान ऑटो रिक्शा आदि ने ले लिया।

बढ़ते हुए प्रदूषण से बचाव और स्वास्थ्य जरूरतों के कारण अब पुनः साइकिलों के प्रयोग के प्रति जागरूकता हेतु प्रयास होने लगे हैं किंतु अपेक्षित सफलता मिलना संदिग्ध ही लग रहा।
स्मार्ट सिटी अवधारणा में साइकिलों की निशुल्क (नाम मात्र एक रुपया शुल्क) उपलब्धता और साइकिल ट्रैक की बात भी की गई है किंतु जमीन पर हकीकत कुछ और कहानी कहती है।

कुछ राज्य आजकल स्कूलों में छात्राओं को निशुल्क साइकिलें प्रदान करती हैं, अच्छी पहल है किंतु आम नागरिक के लिए बाजार में साइकिलों की कीमत बहुत बढ़ गई हैं। सामान्य साइकिलों की बिक्री भी अब पर्याप्त लाभ जितनी नहीं होती  इसलिए उन्नत फिटनेस साइकिलों के नाम पर इनके दाम भी सबकी पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। शौकिया ही खरीद हो रही इनकी। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के बावजूद मोटरसाइकिल और स्कूटर आज भी प्राथमिकता में रहते हैं।

बहरहाल, उम्मीद करें कि हमारे बचपन की साइकिलों के दिन फिर से लौट सकें...

ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, 8 July 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 42 व 43

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 42 व 43

42
अंटियों की सतरंगी खिलखिलाहट

बचपन में जो खास 'गेम्स' खेलते थे उनमें से कुछ अब भी बहुत याद आते हैं।
क्रिकेट तो कुछ बड़े होने पर ही खेलने लगे किन्तु उस वक्त के कुछ 'स्ट्रीट गेम्स' बहुत लुभाते  थे।

किताबी भाषा में जिस खेल को 'गोटी खेलना' या 'कंचे खेलना' कहते हैं उसे हम 'अंटी खेलना' कहा करते थे। अंटी कांच की बनी गोली होती है। इन पारदर्शी रंगबिरंगी अंटियों के भीतर रंगों के इंद्रधनुषी डोरे से पड़े होते थे जो इनके भीतर बहुत खूबसूरत कृतियां सी बनाते थे। कांच की बनी ये गोटियां कई आकारों में मिला करती थीं। छोटी, मध्यम और कुछ थोड़ी बड़ी। सबसे बड़ी को 'रब्बू' कहते थे। यह 'रब्बू' कैरम के स्ट्राइकर की तरह मुख्य भूमिका में प्रहारक होता था। कुछ बड़े रब्बू जो स्टील के बने होते थे उन्हें 'छर्रा' कहा जाता था। ये 'छर्रे' तो बेचारी शिकार अंटियों का कचूमर ही बना देते थे। इन 'रब्बुओं' और 'छर्रों' से खेल में छोटी 'अंटियों' का सीधे शिकार किया जाता था या खास एंगल से इन्हें लुढ़काकर  शिकार अंटी को 'गल' में भेजना होता था। 'गल' याने जमीन पर बनाया गोल्फ की तरह एक छोटा सा गड्ढा जिसमें गोटियों को पहुंचाकर उसे जीत लिया जाता है। कुछ बच्चे इसे 'गच्च' भी कहते थे।

सीधी चोट वाले खेल को  'खड़ी चोट' और अंटी को रब्बू की मदद से गल में पहुंचाने वाले खेल का नाम अभी याद नहीं आ रहा... शायद 'इक्कल' कहते थे। कोई मित्र पुष्टि करेगा ही...।  '
अब जरा इस खेल को खेलने के तरीकों का स्मरण करते हैं।
अंटियों के इस खेल में अनेक बच्चे या पूरी मित्र मंडली हिस्सा ले सकती थी। पहले बराबर बराबर संख्या में अंटियों का सहयोग सभी को करना होता।

आम तौर पर 'खड़ी चोट' खेल में 'गल' किसी दीवार से एक फुट दूर बनाया जाता और उससे कुछ दूरी पर अधिक से अधिक पांच फुट पर एक रेखा खींच दी जाती। इस रेखा पर खड़े होकर खिलाड़ी बच्चा एकत्र की गईं अंटियों को फेंकता है, जिसकी जितनी अंटियाँ गड्ढे में जातीं वे उसकी हो जातीं। जो गड्ढे से बाहर रह जातीं उनमें से अन्य खिलाड़ी द्वारा बताए गए किसी अंटी पर वहीं खड़े रहकर निशाना लगाना होता। अगर निशाना लग जाता है, तो निशाना लगा रहा खिलाड़ी वह बाज़ी जीत जाता , अन्यथा दूसरे खिलाड़ी को ढैय्या (अंटियाँ) फेकने का मौका मिल जाता।

दूसरी तरह के खेल में 'गच्च' या 'गल' मैदान के बीच में रहता है। दूर खींची गई रेखा के पार से उसी तरह जमीन पर अंटियों को लुढ़काकर कुछ इस तरह फैंकना होता था कि गोटी गल में जाए। बाद में वहीं से रब्बू को कैरम के स्ट्राइकर की तरह लुढ़काकर गोटियों को गल में पहुंचाने के प्रयास होते। कई बार अपनी उंगलियों में 'रब्बू' को फंसाकर भी अन्य अंटियों पर प्रहार किया जाता था।

बारिश में भीग गई मोहल्ले की मुलायम मिट्टी के कुछ हिस्सों में घंटों तक हमारा यह खेल तब तक चला करता जब तक कि किसी दोस्त के घर से पिता या कोई बड़ा व्यक्ति गालियां सुनाता डंडा लेकर नहीं आ धमकता।

आज घर की सफाई करते हुए एक पुरानी जुराब में संग्रहित रंगबिरंगी अंटियाँ क्या निकलकर बिखर गईं... लगा  जैसे बचपन के सारे दोस्त   एक साथ खिलखिला पड़े हों...!

43
आकाश में उड़ती इंद्रधनुषी स्मृतियाँ 

बचपन में 'कंचे' खेलने के अलावा गिल्ली डंडा, लट्टू घुमाना आदि में भी सक्रियता रही किन्तु सबसे ज्यादा मजा 'पतंग बाजी' में ही आता था।

गंगा जमुनी संस्कृति वाले हमारे मुहल्ले की कुछ बातें मैंने संस्मरण की पिछली कड़ियों में कही भी हैं।
हमारे घर के सामने की पट्टी हमारी तरह ही निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के घरों की थी। हमारी तरह मनुष्य धर्म में विश्वास के साथ उनकी उपासना पद्धति और जीवन शैली में हमसे से थोड़ी भिन्नता अवश्य थी किन्तु दोनों पट्टियों के रहवासियों के बीच बहुत आत्मीय और पारिवारिक रिश्ते हुआ करते थे।
कहीं कहीं तो राखी बन्ध भाई बहन के सम्बंध भी अंत तक निभाए जाते रहे।

हमारे ठीक सामने जो आपा रहतीं थीं वे बहुत अच्छी पतंगे बनाया करती थीं। पहले से उन्हें यह हुनर नहीं आता था, किन्तु कुछ कारण ऐसे आए कि उन्होंने पतंग बनाना सीखा। सबसे दिलचस्प यह बात थी कि उन्हें पतंग बनाना सिखाने वाले और कोई नहीं, मेरे वही जीनियस काका थे, जिनके पास रहकर मैंने पढाई की और साहित्य,कला के प्रारंभिक संस्कार पाने का सौभाग्य मिला।

उन्हीं आपा के पास बैठकर मैं उन्हें पतंग बनाना देखता रहता था। कैसे हरे बांस की कीमचों को छीलकर पतंग के 'कांप' और 'मुड्डे' बनाए जाते हैं। कैसे कागज के रंगीन 'ताव' की कटिंग करके पतंगों के खास प्रारूप याने 'चील', 'कनकव्वा', 'लम्बोतरा','डग्गा','परियल','पूँछधारी' के कागज की कटिंग की जाती है। तिरंगा, चाँदभात, लँगोटिया,सीरिया जैसी बहुरंगी पतंगों के लिए किस तरह कागज की कतरनों को अलग करके नई कतरन लगाई जाती है। आटे की लेई बनाकर उसे चूहों से बचाने के लिए कितना 'नीला थोथा'(जहर) मिलाना चाहिए। किस तरह पतंग के कागज पर कांप और मुड्डे लगाए जाते हैं। कांप के नमन और मुड्डे की मोटाई का ऊपर नीचे का अनुपात अच्छी उड़ने वाली पतंग के लिए कितना बेहतर होता है।यह सब आपा के करीब बैठकर सीखने का बड़ा मजा हुआ करता था।

मोहल्ले भर के बच्चे आपा से ही पतंग खरीदते थे। मांजा हमे खुद तैयार करना होता था। पुराने बेकार हुए बल्बों और ट्यूब लाइट की रॉड्स, कांच की टूटी बरनियों आदि के कॉन्च को मोटे कपडे में लपेट कर फर्शी पर चटनी पीसने वाले सिलबट्टे से रगड़ रगड़ कर चूर्ण तैयार करते। वांछित रंग,सरेस को घर के पीछे के बाड़े में ईंट के चूल्हे पर पकाते। गाढ़ा होने पर कॉन्च का चूर्ण मिला देते।  किसी मैदान के एक छोर पर इस मसाले से धागा गुजरता, जो कपड़े की चुटकी से संवरता हुआ दूसरे छोर तक ले जाया जाता। जब सूख जाता दूसरे छोर वाला दोस्तअपनी चकरी या 'हुचके' में लपेटता हुआ वापिस पहले किनारे पर लौट आता। आगे के धागे पर यही कारवाई तब दोहराई जाती जब तक कि धागे की पूरी गट्टी खत्म न हो जाती। इस पूरी प्रक्रिया को 'मंजा सूतना' कहा जाता था। घण्टों चलने वाली यह प्रक्रिया मनभावक तो होती ही थी किन्तु पतंगबाजी में पेंच लड़ाने और जीतने की आशा और विश्वास से भरी भी होती थी। अब तो मांजा आदि सब बाजार में तैयार मिल जाता है। चीन से भी आने लगा है। नई परिस्थितियों में आयातित मांजे की क्या स्थिति बनती है कुछ कहा नहीं जा सकता।

पतंग उड़ाने की तरह ही पतंग बनाने और मांजा तैयार करना भी हम बच्चों के लिए बहुत मनचाहा कार्य होता था।
कुछ दोस्त पतंग उड़ाने में तो कुछ पेंच भिड़ाने में कुशल होते थे। कुछ दोस्त हुचका या चकरी थामने में होशियार होते। इस कार्य के अलावा उनका एक दायित्व पतंगबाजी का आंखों देखा हाल सुनाने का भी रहता था। पेंचबाज को वह अन्य पतंगों के खतरों से भी आगाह करता जाता था।

एक समूह ऐसा भी होता था जो न पतंग उड़ाता था,न हुचका थामता था वह कटी हुई पतंगों को पकड़ने के लिए कटीली झाड़ियों से बना एक 'झाँकरा' थामें सड़कों पर दौड़ लगाता रहता था। इस रोचक मगर जोखिमभरी प्रक्रिया  को 'पतंग लूटना' कहा जाता था।

मैं पतंग उड़ाता भी था और पतंग बना भी लेता था। मांजा भी खूब सूता बचपन में। एक वाकया याद आ रहा। आपा से पतंग बनाना सीखकर मेरे मन में थोड़ा लालच आ गया। एक दिन मैंने भी कुछ छोटी छोटी पतंगें बनाकर अपने घर में दीवार पर सजा लीं और मित्रों को कुछ बेच भी दीं।
जब काका साहब को यह बात मालूम पड़ी तो उन्होंने पास बैठाकर समझाया कि मैं यह सब न करूं। अपनी पढ़ाई करूं। उस वक्त तो बात समझ नहीं आई किन्तु अब मुझे यकीन है कि वे नहीं चाहते थे कि जो थोड़ी बहुत आमदनी आपा को पतंग बनाने,बेचने से होती थी,उसमें कोई कमी आए।

बचपन की ढेरों स्मृतियाँ हैं जो आकाश में उड़ती इंद्रधनुषी पतंगों की तरह जीवन में खुशियां भरती रहती हैं...
आज इसी संदर्भ की एक कविता पढ़ लीजिए...

कविता
पतंगबाजी

1
इद्रधनुष आकाश में
जैसे फूलों की घाटी में रंगों का मेला
जैसे भांगड़ा करमा झूमर और कथक का भरत नाट्यम
जैसे मणीपुरी कथकली ओडिसी एक साथ खेलते गरबा

जैसे इच्छाएँ हमारे भीतर की.

2

मगन हैं उड़ती पतंगे
जैसे सुन रहीं हों भीमसेन जोशी का आलाप

राग की तरह बह रही है आकाश में हवा

पता ही नहीं उन्हें कि 
प्रतिद्वंदी हो गए हैं सारे खिलाड़ी
कई अदृश्य डोरें हैं जिनकी तनी हुई पीठों पर सवार होकर   
पतंगों तक पहुँच रहा है आघात-प्रतिघात 

फड़फड़ करती आयेंगी अभी कुछ चील-पतंगें तलवार लिए
समझ नहीं पाएंगी अपनों का अकस्मात हमला

लय में नाचती पतंगें
कटेंगी, बिखरेंगी और अटक जायेंगी 
छत के कंगूरे पर 
पेड़ की टहनी में
बिजली के तारों में उलझ जायेंगे उनके अंग

आकाश में कर्फ्यू लग जाएगा शाम ढले.

000


ब्रजेश कानूनगो

Saturday, 4 July 2020

स्मृति के एकांत से... स्वान्तः सुखाय 41

स्मृति के एकांत से...
स्वान्तः सुखाय 

41
किसान का दुख

'स्त्री' जाति को जिस तरह हमने जगत जननी, देवी, त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति आदि कहकर उसकी वास्तविक चिंताओं,परेशानियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया, ठीक उसी तरह 'अन्नदाता' आदि जैसे सम्मानजनक संबोधनों की आड़ में किसानों के वास्तविक दुख दर्द को समझने में भी हमारा समाज मुंह चुराता रहा है।

'अन्नदाता' के कल्याण के लिए आजादी के बाद से ही कई योजनाएं रूप बदल बदलकर आती रहीं हैं। किसी भी सरकार की नीतियों में 'कृषक कल्याण' की योजनाएं यद्यपि प्राथमिकता में रहती हैं किंतु यह बड़ी विडंबना है कि उनकी दशा ज्यों की त्यों दिखाई देती हैं। किसान के जीवन पर छद्म आधुनिकता का झीना पर्दा अब अवश्य दिखाई देता है किंतु उनके आंसुओं के खार से बदबदाती  खेत,खलिहान  और हृदय की मिट्टी को देख पाना किसी संवेदनशील व्यक्ति के लिए अधिक मुश्किल भी नहीं होगा।

बैंकों के राष्ट्रीकरण के पीछे सबसे बड़ी वजहों में किसान की दशा सुधारना और कृषि में आधुनिक साधनों के माध्यम से उन्नत कृषि को प्रोत्साहन देना भी रहा है। इसके बहुत सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले। भारत खाद्यान के मामले में आत्मनिर्भर भी हुआ। कृषि कार्य में ट्रैक्टरों सहित अन्य उन्नत और आधुनिक साधनों का प्रयोग होने लगा। लेकिन कई बार इन कल्याणकारी प्रयासों के कुछ 'साइड इफेक्ट' भी दिखाई देने लग जाते हैं।  ऋणों का दुरुपयोग होने के अलावा अनचाहे या अनावश्यक और पुनर्भुगतान सामर्थ्य की कमी से किसानों की दशा सुधरने की बजाए बिगड़ती भी गई है।

उदाहरण के तौर पर जिस किसान के पास पर्याप्त जमीन नहीं होती है कि  उसका ट्रेक्टर पर्याप्त रूप से लाभ अर्जित करवा सके। उसने भी ट्रैक्टर के रूप में घर एक हाथी बांध लिया। या कहें कि उसे अनावश्यक रूप से गैर जरूरी ऋण दे दिया गया। यह ऋण अंततः उसके ऊपर बोझ बन  जाता है। ऋण चुकाना लगभग असंभव हो जाता है।
इसतरह की विसंगतियों में बैंकों,सरकारी विभागों द्वारा लक्ष्य आबंटन और वास्तविक जरूरतों में तालमेल के अभाव और भ्रष्टाचार की भूमिका से पूरी तरह इनकार भी नहीं किया जा सकता। यह एक अलग विषय है जिस पर कई बार आर्थिक,सामाजिक विचारक गंभीरता से सचेत करते रहे हैं।
किसान की पारिवारिक कठिनाइयों या मौसम की विकटता के चलते बाद  में जब ऋण डूबन्त या आम समझ में 'एनपीए' की श्रेणी में आ जाते हैं तब 'ऋण माफी', 'समझौता योजनाएं', 'पुनर्भुगतान हेतु नई सूची' आदि जैसी प्रक्रियाएं जोश खरोश के साथ शुरू कर दी जाती हैं। एक तरह से ये भी 'साइड इफेक्ट' ही होता है जिसमें बैंकिंग प्रणाली अपने मूल कामकाज से अलग कामों में व्यस्त हो जाती है। किसान भी अपनी एक समस्या को खत्म करने की कोशिश में नई कठिनाइयों में फंसता जाता है। उसके आँसू कभी कम नहीं हो पाते।

ऊपर से उसकी अपनी जीवन शैली में रूढ़ परम्पराओं का निर्वहन,शादी ब्याह आदि में हैसियत से अधिक का खर्च और दिखावा जैसी बातें भी उसके तात्कालिक सुख को लंबी अवधि के दुख में बदल देता है।

अपनी ग्रामीण पोस्टिंग के दौरान मुझे भी हमारे क्षेत्र के कृषक ग्राहकों के सुख दुख को देखकर बहुत सी अनुभूतियाँ हुईं।
बादलों के घिरने की खुशी और बिन बरसे गुजर जाने का दुख किसानों की आंखों में तैरते देखा। वह समय भी देखा उन दिनों जब क्षेत्र की 'केश क्रॉप' याने सोयाबीन की फसल असमय की खण्ड वर्षा से बर्बाद हो गई थी। कटी फसल खलिहानों में सड़ गई।

इन्हीं संवेदनाओं को मैं किसी कविता में व्यक्त करना चाहता था। उस वक्त कोशिश की भी, किन्तु बात बनी नहीं। ठीक कविता का आना कभी तय नहीं होता। वह जब भीतर से पक कर निकलती है तो हम खुद चकित हो जाते हैं।

उस वक्त की संवेदनाएं आखिर दो ढाई वर्ष बाद कविता में तब व्यक्त हो पाईं, जब मैं बैंक के आंचलिक कार्यालय में 2001 में पदस्थ हुआ।

जब यह कविता बैंक की गृह पत्रिका 'इंदौर बैंक परिवार' में छपी तो उसका उल्लेख प्रधान कार्यालय में 'मासिक निष्पादन बैठक' में हुआ। महाप्रबंधक ने कहा-'ब्रजेश की यह कविता 'पी बैठक' (परफॉर्मन्स मीटिंग) में विचार करने के सूत्र देती है...

अपनी कविता के संदर्भ में यह टिप्पणी बैंककर्मी रचनाकार के तौर पर मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं थी।

बाद में इस कविता को बड़ी फ्रेम में मढ़वाकर इंदौर के 'सोयाबीन अनुसंधान केंद्र' को एक समारोह में आंचलिक प्रमुख ने भेंट भी किया। उम्मीद करें वह पोस्टर  अब भी वहां लगा होगा...

साहित्य की गंभीर पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के बाद अब यह कविता मेरे संग्रह 'इस गणराज्य में' (2014) का हिस्सा है। आज आप भी पढ़ें....

कविता
सोयाबीन की फसल

एक

धरती के आँचल में
उम्मीद के कण बिखेरने के बाद
बादलों की तरह आती जाती है चिन्ताएँ

बंगाल की खाडी से उठा चक्रवात
छत्तीसगढ को ही भिगोकर लौट न जाए कहीं
उडीसा में बना कम दबाव
हवा न हो जाये मालवा तक आते आते

अरब सागर की मेहरबानी से
फट पडे आसमान
बरस जाए प्रलय का पानी
सपनो की नई बस्ती पर
तो क्या होगा सोयाबीन की फसल का

नष्ट न करदे आतंकी इल्लियाँ सोयाबीन के परिवार को

सूरज की चमक और आकाश के अंधेरो के साथ
बदलते है हरिया किसान के चेहरे के रंग

बडा ही जीवट वाला है
मौसम के हर मिजाज मे

पिता की तरह पालता है अपनी फसल को
सोयाबीन नही
खुशियों की फसल उगाता है
धरती का  बेटा  ।

दो

बडी जोरदार हुई थी बारिश
और सोयाबीन की फसल उस साल
पिताजी गए थे चारों धाम
मुन्ना की आई थी नई मोटरसाइकिल

दौडने लगा था नया ट्रेक्टर
सोयाबीन की फसल के बाद

गाँव-गाँव से आए थे
हजारों पाहुने बेटी के ब्याह में
दिखाई देता था उनके चेहरों पर
सोयाबीन की फसल का उत्साह

गूंज उठा था सोयाबीन का संगीत
गाँव की हवाओं में

ईद की मिठास,दिवाली का उजास
और होली की उमंग है
सोयाबीन की फसल
फसल से जुडे हैं किसान के उत्सव

धडकन की तरह बजता है सोयाबीन
किसान के जीवन में।

000



ब्रजेश कानूनगो

Friday, 3 July 2020

स्मृति के एकांत से ... स्वान्तः सुखाय 39 व 40

स्मृति के एकांत से ... 
स्वान्तः सुखाय 39 व 40 

39
जय जवान जय किसान 

यह मेरा सौभाग्य ही था कि अनिवार्य ग्रामीण पोस्टिंग के लिए बैंक ने मुझे बरोठा जैसी ग्रामीण शाखा का शाखा प्रबंधक बनाया था।

एक रचनाकार  के नाते भी बैंक प्रबंधन का सदैव कृतज्ञ रहूंगा जिसके कारण किसानों और ग्रामीण समाज के जीवन को निकट से अनुभव करने का थोड़ा सा अनुभव मिल सका।

छोटे से गांव में स्थित बैंक शाखा के प्रबंधक को उस वक्त तक तो बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उन दिनों जिन अनुभूतियों से मैं गुजरा वे मेरे लिए हमेशा के लिए मन में बस गईं हैं।

मैंने महसूस किया कि जो परिवार खेती के साथ साथ अन्य हुनर भी जानते हैं उन परिवारों की युवा पीढी कामकाज की तलाश में शहरों,महानगरों की ओर पलायन कर जाते हैं। जहां कारपेंटरी, इलेक्ट्रिशियन, प्लम्बर आदि के अलावा कारखानों में उन्हें रोजगार मिल जाता है।

इसके उलट बहुत से किसान युवक पुश्तैनी खेती में ही पूरी तरह खप जाते हैं। इन्ही परिवारों के बहुत से किसान पुत्रों में सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने की राष्ट्रीय भावना कूट कूट कर भरी होती है। जय जवान जय किसान का नारा बहुत से ग्रामीण परिवारों में चरितार्थ होता दिखाई दिया मुझे।

कारगिल युद्ध (1999-2000) में विजय के बाद गाँव के कुछ सैनिक बेटे घर आए तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। गांव भर में ढोल बाजों के साथ उनका जुलूस निकाला गया। युवक पूरे समय सैनिक गणवेश में अभिवादन स्वीकार करते रहे। चौराहों पर पुष्पमालाओं से उनका अभिनन्दन किया गया।
हमारे बैंक कार्यालय में भी उनके सम्मान का एक कार्यक्रम रखा गया। अंततः हम लोग भी उसी गाँव के परिवार का हिस्सा हो गए थे।

कोतवाली के अलावा बैंक शाखा ही एक ऐसी संस्था थी जिसकी भागीदारी की गांव वालों में काफी आकांक्षा व प्रतिष्ठा होती थी।
बैंक के उस दिन के उस संक्षिप्त सैनिक सम्मान समारोह में बरोठा नगर के बड़े छोटे व्यापारी, शासकीय कर्मचारी, ग्राहक, किसान, पंच सरपंच सभी शामिल हुए थे।

निसंदेह उस दिन शाखा परिसर में देशप्रेम की जो हवा बहने लगी थी और भारतीयता की गौरव लहरें मन के सागर में बहुत दिनों तक उमड़ती रहीं , वह अविस्मरणीय ही हैं....

40 
'सेठजी' से मुलाकात 

कभी कभी ऐसे दिलचस्प प्रसंग उपस्थित हो जाते हैं कि हम आश्चर्य और खुशी से भर उठते हैं। ऐसा ही कुछ उस वक्त घटा था जब मैंने पहली बार अपने ग्रामीण दफ्तर का कार्यभार संभाला।

बैंक की बरोठा ग्रामीण शाखा में जिस दिन मैंने अपने पूर्ववर्ती प्रबन्धक को कार्यमुक्त करके अपना पदभार ग्रहण किया था, स्टाफ सदस्यों ने स्वागत और विदाई में एक छोटा सा आत्मीय कार्यक्रम रख लिया। इस बैठक में सरपंच, व्यवसायियों,सरकारी विभागों के कुछ सम्मानित ग्राहकों को भी आमंत्रित कर लिया गया।

शाखा के एक प्रतिष्ठित व्यापारी भी आमंत्रित किये गए थे। जैसे ही उन्होंने शाखा में प्रवेश किया पुराने प्रबन्धक और कुछ स्टाफ सदस्य उठकर द्वार तक उन्हें लिवाने चले गए।

बैठक में मैने गौर किया कि वे सम्मानित ग्राहक जिन्हें 'सेठजी' कहा जा रहा था मेरी ओर अपलक देखते रहे। बिदाई और स्वागत की औपचारिकताओं के बाद जब चाय पान के बाद बातचीत शुरू हुई तो 'सेठजी' थोड़ा मेरे और करीब आ गए। मुझे भी अब ऐसा अवश्य लगने लगा था कि वे मुझमे कुछ ज्यादा ही रुचि ले रहे थे।  आखिर उनसे रहा नहीं गया। थोड़ा संकोच से बोले-' आप देवास में कहाँ रहते थे?'
मैने जब बताया कि मैं देवास विकास प्राधिकरण की बनाई नई कॉलोनी विजय नगर में रहता हूँ। अपना घर वहीं खरीद लिया है।
किन्तु वे इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए। कहने लगे-'देवास के नाना बाजार से आपका कुछ सम्बन्ध रहा है कभी?'
'हाँ, सेठजी वह तो मेरा बचपन का पुश्तैनी मोहल्ला है।' मेरा इतना कहते ही वे उठ खड़े हुए और खुशी से बोल उठे- 'तुम ब्रजेश ही हो न?'
'जी, बिल्कुल! मगर आप?...
'अरे मैं 'गोपाल'(परिवर्तित) हूँ। हम दोनों अत्रे भवन स्कूल में एक साथ टाटपट्टी पर बैठकर पढ़े हैं। रामदुलारे माटसाब हमारे हेडमास्टर साहब थे।'

अब क्या था। सेठजी ने उठकर मुझे गले लगा लिया।
अपने बचपन के दोस्त का इस तरह मिलने की जो अनुभूति हुई थी वह मैं और गोपाल सेठ ही शायद समझ सकते हैं।
बाद में गोपाल सेठ ने बचपन की उस मित्रता को खूब यहां भी निभाया। शाखा में जब कभी अकस्मात नकदी की कमी पड़ जाती, देवास से रोकड़ आने तक सेठजी धन भिजवा दिया करते उनके खाते में जमा करवाने के लिए। हमारा काम चल जाता। गांव के अधिकाँश ग्राहकों का बहुत स्नेह सहयोग मिलता रहा। गोपाल सेठ का प्रेम तो सचमुच हमारे लिए द्वारकाधीश की तरह उदात्त था। बालसखा जो थे हम दोनों।

गोपाल सेठ भी हमारे स्कूल में ही पढ़े थे। दरअसल,देवास के आसपास के गांवों के बहुत से बच्चे हमारे मोहल्ले में ही किराए का कमरा लेकर पढ़ाई किया करते थे। अत्रे भवन प्राथमिक शाला में पांचवीं तक की शिक्षा मोहल्ले में ही मिल जाती थी। नाना बाजार (अब रज्जब अली खां मार्ग) हमारा मुहल्ला था। अत्रे भवन स्कूल भी उसी गली में स्थित था।

पिछली कुछ किश्तों में मैंने अपने मोहल्ले को स्मरण किया है। आगे मैं अपने उस स्कूल के बारे में भी कुछ और कहने का प्रयास करूंगा।

आज अपने मोहल्ले पर लिखी  25 वर्ष पुरानी मेरी वह कविता पढ़ लीजिये यहां, जिसे गोपाल सेठ ने भी अवश्य वैसा ही जिया होगा जैसा मैंने....यह कविता नईदुनिया अखबार के बहुत लोकप्रिय और विशिष्ट 'दीपावली विशेषांक' में प्रकाशित हुई थी.....

कविता
मेरा मुहल्ला

कहाँ गया मेरा मुहल्ला
जो मै छोड़ गया था बीस बरस पहले यहीं कहीं

नहीं दिखाई दे रहा वह नुक्कड़ का हलवाई
रस से भरी मिठाइयाँ दूर दूर तक जाती थी जिसकी
चिढ़ती-झल्लाती जगत बुआजी
जिसके बरामदे में होली पर गंदगी फैंक आया करते थे हुड़दंगी
अंगूठा छाप टेलर मास्टर जिन्हे मैंने
चंद्रकांता संतति पढ़कर सुनाई थी रोज-रोज
अख्तरख़ान जिसे देखकर हम गली में छुप जाते थे इस डर से
कि कहीं वह हमारी किताबें न छीन ले

वह काला और मरियल सा नन्हा शायर
जो मधुर आवाज में गाया करता था फिल्मी गाने
क्रिकेट की गेंद जब्त कर लेने वाली कठोर महिला
जो पहले तो डांटती थी
फिर उढ़ेल देती थी स्नेह का पूरा समुद्र
न जाने कहाँ चले गए हैं सब

वह इमली का पेड़ जो दादी की कहानियों के प्रेत की तरह
हमारी पतंग को पकड़ लिया करता था अक्सर
वह टूटा पुराना ध्वस्त मकान भी दिखाई नही दे रहा
जिसकी सड़ी हुई लकड़ियाँ होली में जलाते रहने से
हमारा चंदा बच जाया करता था-सिनेमा देखने के लिए

शायद यही है मेरा मुहल्ला लेकिन
उग आया है एक बाजार हमारी गेंद पट्‌टी पर
होली के वृक्ष की स्थापना चिंता की बात हो गई है
टेलर की दुकान में खुल गई है एक नई दुकान
जो अंग्रेजी माध्यम में सिखा रही है त्यौहार मनाना

गर्म जलेबियों की खुशबू नही बिखरती अब नुक्कड पर
नई जमीन के नक्शे पर
सपने बेच रहा है हलवाई का बेटा

धराशायी मकान की भस्म पर खड़ी हो गई है ऊँची इमारत
जिसकी ओट में छिप गया है नीला कैनवास
पतंग के रंगों से बनते थे जिस पर स्मृतियों के अल्हड़ चित्र

वैसा ही हो गया है मेरा मुहल्ला
जैसे कोई कहे-कितना अलग है तुम्हारा छोटा बेटा ।

000


ब्रजेश कानूनगो

स्मृति के एकांत से... स्वान्तः सुखाय 38


स्मृति के एकांत से...
स्वान्तः सुखाय 38

38
स्कूटर पर सवार गणेश

इस बात को अब दोहराने की आवश्यकता नहीं रही है कि  जन जागरण के उद्देश्य से जिस रूप में बाल गंगाधर तिलक जी ने सार्वजनिक 'गणेशोत्सव' की परंपरा देश में शुरू की थी उसका स्वरूप अब बिल्कुल बदल चुका है।

गणेशोत्सव का जैसा रूप देवास में पहले हुआ करता था वैसा अब नही रहा। सब कुछ बदल गया।

ख्यात शास्त्रीय गायक पंडित कुमार गन्धर्व जी की अध्यक्षता वाले 'शिव छत्रपति गणेश मंडल' के कार्यक्रमों का सालभर हमें इंतज़ार रहता था। हम लोग सौभाग्यशाली रहे कि हमारी पीढी ने तब के गणेशोत्सव कार्यक्रमों में पंडित भीमसेन जोशी,हरिप्रसाद चौरसिया,शोभा गुर्टू,शंकर शंभू जैसे नामचीन कलाकारों को देखते सुनते हुए कला संस्कृति के संस्कार पाए। बहुत सी प्रतिभाओं ने शहर के छोटे छोटे गणेश मंडलों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते बड़ी हुई और प्रसिद्धि पाई है।

एक जागरूकता अवश्य अब देखी जाती है इन दिनों। शहर के कुछ स्कूलों में पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से बच्चों को मिट्टी के गणेश बनवाने का प्रशिक्षण भी दिया जाने का प्रयास होता है।

फिर भी महाराष्ट्र, दक्षिण के कुछ राज्यों और मध्यभारत के कुछ क्षेत्रों में मोहल्लों व घरों में गणेश चतुर्थी से लेकर अनन्त चतुर्दशी तक दस दिनों  गणेश प्रतिमा स्थापित कर पूजन अर्चन के साथ साथ कुछ सांस्कृतिक और मनोरंजक कार्यक्रमों के आयोजन करने के प्रयास होते हैं। कवि सम्मेलनों और कुछ जगह मुशायरे भी होते हैं किंतु पहले वाली गंभीरता और रुचि अब उतनी नहीं रही।

अब तो अपनी सुविधा से कुछ घरों में डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन भी गणेश बैठाए जाने लगे हैं। पुणे, मुम्बई और इंदौर के गणेश उत्सव तो देश दुनिया में काफी ख्याति अर्जित कर चुके हैं।

यहां बात मैं अपने बचपन के अपने नगर की ही करता हूँ। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश प्रतिमाएं बाजार से लाने का बड़ा उत्साह रहता था। चौराहों पर अनेक दुकानें सजी होती थीं। जो लोग गणेशजी की कलात्मक प्रतिमाओं में रुचि रखते थे वे नगर के कुशल और नामी कलाकारों द्वारा बनाई मूर्तियां ही खरीदते थे। देवास सीनियर के धर्माधिकारी बन्धु, देवास जूनियर के कापडे माटसाब द्वारा बनाई गई प्रतिमाओं का सौंदर्य,कलात्मकता और मटेरियल की फिनिशिंग, रंग रोगन बहुत उत्कृष्ट हुआ करता था। बड़े बड़े संस्थानों के यहां उन्ही के यहां से छोटी बड़ी प्रतिमाएं ढोल नगाड़ों के साथ ले जाएं जाती थीं।

देवास में होने वाले गणेशोत्सव का ही शायद प्रभाव रहा कि बचपन से ही गणपति प्रतिमा से मुझे बड़ा अपनत्व व जुड़ाव रहा है। कई बार घर में ही कागज की लुगदी, पीली मिट्टी आदि से बड़ी मेहनत करके गणेश प्रतिमाएं बनाया करते थे। बाजार की प्रतिमाओं जैसे भले ही नहीं बनते, किन्तु उन्हें बनाने में मजा बहुत आता था।

जब थोड़ा बड़ा हो गए तो फिर पढाई वगैरह के कारण प्रतिमा बनाना छोड़ दिया। वर्षों बाद पिछले बरस जब बच्चों ने घर में ही प्रतिमा बनाने का आग्रह किया तो पुनः इस कला में हाथ आजमाने की कोशिश की थी। पड़ोसी के बच्चों को भी प्रतिमा बनाना सिखाया। नीचे उस दिन के चित्र दे रहा हूँ।

गणेशजी की विभिन्न रूपों में बनाई गई प्रतिमाओं को देखने खरीदने का शौक हमेशा बना रहा। गणेशजी की प्रतिमा को जितने विविध स्वरूप दिए गए हैं उतने शायद ही किसी भगवान की मूर्ति में प्रयोग हुए होंगे। जो भी तत्कालीन ज्वलन्त मुद्दा समाज मे रहता है, गणेशजी उसी रूप में उपलब्ध हो जाते हैं। कभी मुनीम, कभी संगीतकार, कभी कम्प्यूटर संचालक, कभी ट्रेक्टर चलाते किसान, कभी सैनिक, कभी कर्नल, यहां तक कि जनरल मानिक शॉ के प्रतिरूप वाले गणेश जी भी मैंने देखे थे। बाँसुरी बजाते मुरलीधर, वीणावादिनी की तरह वीणा बजाते,कभी शिवाजी महाराज की तरह तो कभी होलकर वंश की पगड़ी या गांधी टोपी धारण किए गणेश जी दिखते रहे हैं।

गणेश जी की सवारी आमतौर पर चूहा होती है किंतु इससे हटकर भी कई प्रयोग हुए हैं। कार्तिकेय के बगल में मयूर पर विराजे, तो कभी गजराज पर गजमुख सहित गणेश, कभी बस में सवारी करते, तो कभी विमान के पायलट की तरह। जब आर्मस्ट्रॉन्ग ने चांद पर पहला कदम रखा था, हमारे गणेश जी भी एस्ट्रोनॉट बनकर प्रतिमा में अवतरित हुए। इस संदर्भ में एक बड़ा दिलचस्प वाकया मुझे याद आता है।

प्रतिमाओं की विभिन्नता देखने के लिए हम लोग कई जगह इसी उद्देश्य से जाते थे कि देखें इस बार कौनसी नई प्रतिमा अलग हटकर लाई गई है। देवास के सुभाष चौक स्थित घण्टाघर के आसपास की बात है। तब मैं बैंक की देवास मुख्य शाखा में पदस्थ था। चौराहे पर हमारे एक मित्र मिल गए जो मेरी इस प्रवत्ति को जानते थे, मुझे देखकर बोले -'अरे देखो उधर...वहां स्कूटर पर बैठे गणेश मिल रहे हैं!'  जिज्ञासा वश उधर के स्टाल की तरफ जाकर स्कूटर सवार गणेश जी को तलाशने लगा। किन्तु निराशा हाथ लगी। वहां वैसी कोई प्रतिमा नजर नहीं आई। मैंने मुडकर मित्र से जानना चाहा कि कहां देखे उन्होंने स्कूटर सवार गणेशजी?
तब हंसते हुए उन्होंने स्टाल के सामने इशारा करते हुए कहा- 'वह क्या बैठे हैं स्कूटर पर!'
वहाँ प्रतिमा तो नहीं करीब 90 किलो वजन वाले हमारे एक अन्य साथी स्कूटर पर ही बैठे बैठे छोटी सी प्रतिमा का मोल भाव कर रहे थे। फिर क्या था ठहाके लग उठे।

आज भी जब वह किस्सा याद आता है चेहरे पर मुस्कुराहट तैर जाती है...


ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, 30 June 2020

स्मृति के एकांत से...स्वान्तः सुखाय 36 व 37


स्मृति के एकांत से...
स्वान्तः सुखाय 36 व 37
36
खिलौना स्मृतियों में परिजात की खुशबू

आषाढ़ी पूर्णिमा पर देवास में चामुंडा पहाड़ी की तलहटी में तीन दिवसीय मेला लगता था। ग्रामीण प्रकृति के इस मेले की बहुत सारी मजेदार बातें पिछली कड़ियों में मैंने विस्तार से लिखीं हैं।
उस जत्रा में खिलौनों की दुकानों पर बच्चों की बड़ी भीड़ उमड़ती थी। लकडी की चमकीली तलवारों, बांसुरियों के साथ मिट्टी के खिलौनों का बडा आकर्षण रहता था। मेले के दौरान बरसात तो आनी ही होती थी। हम बच्चे थैली भरकर मिट्टी के बने सुंदर सुंदर खिलौने खरीद लेते और बरसात में भीगते हुए चहकते हुए घर लौटते थे।

'जत्रा' में से खरीदे गए खिलौनों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जाती थी। बहुत संभाल कर रखा जाता था इन्हें। कुछ खिलौने तो पिताजी और काका साहब के बचपन में खरीदे हुए भी संग्रहित थे। चीनी मिट्टी से बनी जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल की सफेद मूर्तियां बहुत सहेज कर रखीं हुईं थीं। इंग्लैंड की महारानी व कुछ पुराने खूबसूरत गुलदान भी हमारे यहां थे।
इस संग्रह को हमने भी मिट्टी के सेठ सेठानी, मर्फी बॉय, नाचती लड़की, ग्वालन, धेनु से पीठ टिकाए बांसुरी बजाते गोपाल,शिवाजी,बुद्ध,शिरडी के साईं बाबा,हाथी,घोड़ा, ऊंट, तोता, सारस आदि जैसे नए खिलौनों से समृद्ध किया।

दरअसल, इन खिलौनों का जिस भी घर में अच्छा संग्रह होता था उसकी 'झांकी' बहुत अच्छी जमा करती थी। झांकी जमाने के दो अर्थ होते हैं। एक अर्थ तो 'साख' जमाना और दूसरे अर्थ में वह 'झांकी' जो सचमुच भौतिक रूप से किसी उत्सव आदि पर सजाई जाती है। गणतंत्र दिवस पर देश की राजधानी में और अन्य जगहों पर धार्मिक, सामाजिक चल समारोह में भी कुछ इसी तरह सजी संवरी झांकियां निकालने की परंपरा रही है।

यहाँ मेरा आशय उस झांकी से है जो हमारे नगर के लगभग प्रत्येक घर में गणेशोत्सव के अवसर पर दस दिन के लिए सजाई जाती थी। गणेश चतुर्थी के दिन मिट्टी की बनी गणपति की प्रतिमा लाकर उसकी स्थापना की जाती थी। सीढी नुमा उनका भव्य आसन बनाया जाता था। सबसे ऊपर के आसन पर गणेश जी विराजते। उनके आसपास गुलदानों में पुष्प सजाए जाते। नीचे की पायदानों पर 'जत्रा' से लाए खिलौना संग्रह के ऐतिहासिक चरित्र, पशु पक्षी,देवी देवताओं की मिट्टी की प्रतिकृतियां शोभा बढ़ातीं। इसी लिए मैंने कहा कि जिस बच्चे का खिलौना संग्रह जितना समृद्ध होता था, उसकी 'झांकी' खूब जमती थी।

बात इतनी ही नही है। जिस कमरे में गणेश जी की यह झांकी बनाई जाती, उसका फर्श भी प्रकृति के किसी सुंदर मॉडल की तरह बना दिया जाता था। जिसमें हरे भरे लॉन होते। बगिया होती। नदी,पहाड़,झरने,पशु-पक्षी, किसान, खेत खलिहान, झोपड़ियां सब कुछ। हमारे खिलौनों में जैसे प्राण से आ बसते थे। गणेश प्रतिमा के दरबार में एक दुनिया बस जाती, जीवन की हर धड़कन झांकी में सुनने लगते थे हम बच्चे।

रंगोली के खूबसूरत रंगों से झांकी वाले कमरे का फर्श ही नहीं पूरा वातावरण रंगीन हो जाता था। आंगन में लगे परिजात के पेड़ से केसरिया डंडियों वाले मुलायम पुष्प झरते रहते थे। इन्हीं फूलों की माला को जब झांकी में स्थापित प्रतिमा पर चढ़ाया जाता था तो समूचा वातावरण किसी दिव्य सुगन्ध से सराबोर हो जाता था।

बचपन की उन खिलौना स्मृतियों को आज भी परिजात के फूलों की अलौकिक खुशबू महकाती रहती है।

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व्रत करती स्त्री

गणेश चतुर्थी के ठीक एक दिन पहले परिवार व कुटुंब की महिलाओं का बहुत महत्वपूर्ण व्रत हुआ करता था। 'हरतालिका' का व्रत पर्याप्त वर्षा हो जाने के बाद भाद्रपद,शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन किया जाता है।
इस दिन परिवार की महिलाएं दिन भर भूखी रह कर हर प्रहर की समाप्ति पर वनस्पतियों, विशेषतः बेलपत्र, शमी पत्र, केले का पत्ता, धतूरे का फल एवं फूल, अकांव का फूल, तुलसी, मंजरी, सभी प्रकार के फूलों और विभिन्न पेड़ पौधों की हरी पत्तियों से गीली मिट्टी से बनाई गौरी और शंकर की प्रतीकात्मक मूर्तियों की पूजा करतीं। मुख्य पूजा संध्या समय प्रदोषकाल में सभी महिलाएं सामूहिक रूप से करती थीं। रातभर जागरण के पश्चात सुबह तड़के तड़के महाआरती के पश्चात यह व्रतोत्सव पूर्ण होता।

हम बच्चों के लिए भी यह माकूल रहता था क्योंकि अगली सुबह हमारे गणेशोत्सव की धूम शुरू होने वाली होती थी। रातभर हम लोग भी गणेश प्रतिमा स्थापना और झांकी बनाने की योजना बनाने में मशगूल व उत्साह से भरे रहते थे। उन दिनों आज की तरह फूल पत्तियां बाजार में एक साथ मिलती नहीं थी। कई बार हम बच्चों को ही इधर उधर से हरी पत्तियां आदि ढूंढ ढाँढ कर लाना पड़ती थीं। रात को विशेष सावधानी रखना होती, दादी माँ की हिदायत रहती कि किसी भी हालत में 'चांद' को नहीं देख लेना है, वरना चोरी का लांछन लग सकता है। लोक मान्यता रही है कि चतुर्थी का चन्द्रमा देख लेने पर चोरी का आरोप लगने की संभावना रहती है।

घर की महिलाओं के साथ हम लोगों का भी रात भर का जागरण हो जाता। सुबह जब हरतालिका की आखिरी आरती होती तब हमारी आंखें मुंदने लगती। थोड़ा बहुत सोने का प्रयास करते किन्तु अर्धनिंद्रा के बीच ढोल नगाड़ों की आवाजों और 'गणपति बप्पा मोरिया' का उद्घोष ऐसा होने नहीं देता था...

आइए आज हरतालिका व्रत की उन अनुभूतियों से बरसों बाद निकली कविता को पढ़ लेते हैं..
कविता
व्रत करती स्त्री

प्यासी रहती है दिनभर
और उडेल देती है ढेर सारा जल शिवलिंग के ऊपर

पत्थर पर न्यौछावर कर देती है
जंगल की सारी वनस्पति

बनाकर मिट्टी का पुतला
नहला देती है उसे लाल पीले रंगों से

लपेटती जाती है सूत का लम्बा धागा
पुराने पीपल की छाती पर

करती है परिक्रमा पवित्र नदी की
और लगा लेती है चन्दन का लेप पैरों के घावों पर

सरावलों में उगाकर हरे जवारे
प्रवाहित करती है सरोवर में उन्हे

क्षयित चन्द्रमा को चलनी की आड से निहारते हुए
पति के अक्षत जीवन की कामना करती है
व्रत करती स्त्री

एक आबंध की खातिर
सम्बन्धों की बहुत बडी डोर बुन रही है
जैसे बाँध लेना चाहती है धरती-आकाश।

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